*पेट काटकर जनता बचाए, मोदीशाही अमेरिका की भेंट चढ़ाए!*
*(आलेख : राजेंद्र शर्मा)*
*प्रकाशनार्थ*
*पेट काटकर जनता बचाए, मोदीशाही अमेरिका की भेंट चढ़ाए!*
*(आलेख : राजेंद्र शर्मा)*
नरेंद्र मोदी के राज ने जिस एक चीज में सबसे ज्यादा महारत हासिल की है, वह यह है कि वास्तव में यह सरकार जो करती है, उससे ठीक उल्टा करने का ढोल पीटती है। इसका ताजातरीन उदाहरण, अमेरिकी विदेश सचिव (मंत्री) मार्को रूबियो की हाल की भारत यात्रा के दौरान, बहुत ही गाढ़े रंग से रेखांकित होकर सामने आया है। बेशक, अमेरिकी विदेश मंत्री का जिस तरह लाल कालीन बिछाकर स्वागत किया गया, उसमें भी बहुत कुछ ऐसा था, जिसकी अस्वाभाविकता विदेश संबंधों के अनेक जानकारों की आंखों में खटकी है। सामान्य प्रोटोकॉल यह है कि बाहर से आने वाले किसी भी मेहमान मंत्री की, पहले मेजबान देश के अपने समकक्ष या समकक्षों से विस्तृत वार्ताएं होती हैं और इन वार्ताओं में ही वास्तविक निर्णयों पर पहुंचा जाता है। बाद में मेहमान मंत्री की मुलाकात, जो रस्मी और संक्षिप्त होती है, कार्यपालिका के मुखिया से होती है, जिसमें मेहमान अगर मेजबान देश के शीर्ष नेता के लिए अपने देश के शासन प्रमुख का कोई संदेश लाया हो, तो वह संदेश देता है और अगर कोई समझौते हो रहे हों, तो उन पर औपचारिक रूप से मोहर लगायी जाती है।
लेकिन, अमेरिकी विदेश सचिव के लिए इस सामान्य प्रोटोकॉल को परे खिसकाना जरूरी समझा गया। कोलकाता में उतरने के बाद, दिल्ली पहुंचने पर रूबियो की मुलाकात सीधे प्रधानमंत्री मोदी से हुई। इस मुलाकात के समय भारत के विदेश मंत्री तथा वाणिज्य मंत्री भी मौजूद थे और यह मुलाकात एक घंटे से लंबी चली बताते हैं। जाहिर है कि अभिवादन, अभिनंदन, संदेशों के आदान-प्रदान का सिलसिला तो इतनी देर तक नहीं चल सकता था। ऐसा लगता है कि वार्ताओं के मुख्य सूत्र, सीधे प्रधानमंत्री के साथ इस बातचीत में ही तय किए गए होंगे। बेशक, यह मोदी सरकार में प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय में लगभग सारे निर्णय केंद्रित कर दिए जाने की सच्चाई को भी दिखाता है। लेकिन, यह वर्तमान भारत-अमेरिका रिश्ते की नाबराबरी को भी दिखाता है, जहां सरकार खुद ही यह मानकर चलती नजर आती है कि प्रधानमंत्री को लाख प्रिय होने के बावजूद, भारतीय विदेश मंत्री को, अमेरिकी विदेश मंत्री की बराबर में नहीं बैठाया जा सकता। उससे तो खुद प्रधानमंत्री की वार्ताएं होना जरूरी है। संभवत: सत्तर के दशक की एक बंबईया फिल्म का गीत इस भावना का पूरी तरह से बयान कर सके —बंबई से आया मेरा दोस्त, दोस्त को सलाम करो! वाशिंगटन से आया दोस्त, उसका खास स्वागत तो होना ही था!
लेकिन, रिश्ते की नाबराबरी सिर्फ प्रोटोकॉल के उलटफेर पर तो रुकने वाली थी नहीं। अमेरिकी विदेश सचिव की नजरों में उनकी यात्रा का जो हासिल रहा, उसमें यह नाबराबरी भारत के लिए अपने और घातक रूप में सामने आ जाती है। अपने एक ट्विटर संदेश में रूबियो ने भारत में अमेरिका के राजदूत तथा अमेरिकी कूटनीतिज्ञों के प्रयासों की सराहना करने के बहाने से, सार्वजनिक रूप से इसकी याद दिलायी कि, 'भारत ने अगले पांच वर्ष में 500 अरब डालर के अमेरिकी माल खरीदने का वचन दिया है, जिसके केंद्र में ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और कृषि (उत्पाद) होंगे।' जाहिर है कि अमेरिकी विदेश सचिव की नजरों में भारत को इसके लिए वचनबद्घ करना, 'राष्ट्रपति ट्रम्प और अमेरिकी जनता के हित में जबर्दस्त काम है' जिसके लिए वह अपने देश के प्रतिनिधियों की पीठ ठोक रहे थे।
जैसा कि जाने-माने अर्थशास्त्री, प्रोफेसर प्रभात पटनायक ने बलपूर्वक रेखांकित किया है, किसी आर्थिक समझौते के नाम पर अमेरिका द्वारा अपने मालों की खरीद की ऐसी शर्त थोपा जाना, भारत-अमेरिका रिश्तों में साधारण नाबराबरी का ही नहीं, वास्तव में ऐसी नाबराबरी का भी द्योतक है, जो औपनिवेशिक दौर की याद दिलाती है। औपनिवेशिक दौर में ही उपनिवेशकर्ता देश, अपने उपनिवेशों पर अपने मालों की खपत थोपने के जरिए, निरुद्योगीकरण थोपता था, ताकि उसके बल पर, उसकी औद्योगिक तरक्की की गाड़ी के चक्के चलते रहें। कहने की जरूरत नहीं है कि भारत के सिर पर पहले ऊंचे टैरिफ की तलवार लटकाने और उसके बाद, टैरिफ की दर कम करने के एवज में भारत से सरासर इकतरफा व्यापार रियायतें हासिल करने के लिए ट्रंप निजाम द्वारा थोपे गए व्यापार समझौते में, अमेरिका ने भारतीय मालों के लिए ऐसी कोई वचनबद्घता स्वीकार नहीं की है। यह तब है, जबकि अब तक भारत, अमेरिका के साथ व्यापार में लाभ कमाता आ रहा था यानी अमेरिका से जितना आयात कर रहा था, उससे ज्यादा अमेरिका को निर्यात कर रहा था। जाहिर है कि ट्रम्प प्रशासन भारत के व्यापार लाभ को, व्यापार घाटे में तब्दील करने का इंतजाम कर रहा है।
और यह व्यापार घाटा भी बहुत भारी होने वाला है। याद रहे कि 31 मार्च 2026 को समाप्त हुए वित्त वर्ष में भारत का कुल विदेश व्यापार घाटा 119.3 अरब डालर का था। वास्तव में यह घाटा इससे पहले के वर्ष के 94.66 अरब डालर से बढ़कर इस स्तर पर पहुंचा था। इस बढ़ते हुए व्यापार घाटे को, अमेरिका से 100 अरब डालर के माल हर साल खरीदने की बाध्यता, किस स्तर पर पहुंचा देगी, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। यह भी याद रहे कि कुल विदेश व्यापार से भिन्न, जिसमें सेवाओं का निर्यात एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, मालों के व्यापार में भारत का घाटा और भी बढ़ा है। 2025-26 में यह घाटा 333.19 अरब डालर का था, जो उससे पहले के साल के 283.50 अरब डालर से ठीक-ठाक बढ़ोतरी को दिखा रहा था। अमेरिका से 100 अरब डालर सालाना के माल खरीदने की बाध्यता, जाहिर है कि इस असंतुलन को और बढ़ा देगी। एक अनुमान के अनुसार, इससे भारत का व्यापार घाटा दोगुना तक हो सकता है।
जाहिर है कि यह एक ही झटके में भारत की विदेशी मुद्रा संसाधनों की बाल्टी की तली में बहुत बड़ा छेद किए जाने का मामला है। लेकिन, इसी महीने के शुरू में, विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के फौरन बाद, पांच दिन की विदेश यात्रा पर निकलने से पहले, प्रधानमंत्री मोदी ने पहले हैदराबाद में और फिर गुजरात में अपने भाषणों में जनता से कमखर्ची, बल्कि कटौती करने की जो, देशभक्ति की दुहाई से भरी भावपूर्ण अपील की थी, उसका सार क्या था? विदेशी मुद्रा बचाओ! एक साल सोना न खरीदने या एक साल विदेश यात्रा न करने से लेकर, पेट्रोल-डीजल बचाने तक ही नहीं, खाने में कम तेल खाने से लेकर, रासायनिक खादों का कम उपयोग करने तथा वर्क फ्रॉम होम करने तक, सभी मांगों का एक ही लक्ष्य था —विदेशी मुद्रा बचाना!
दूसरे शब्दों में, एक ओर तो प्रधानमंत्री द्वारा जनता से कष्ट उठाकर और उपभोग घटाकर विदेशी मुद्रा बचाने की मांग की जा रही थी, ताकि बाल्टी के छोटे-छोटे छेद बंद किए जा सकें और दूसरी ओर, उन्हीं की सरकार ट्रंप के 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' की कामयाबी में अपने योगदान के तौर पर, विदेशी मुद्रा की बाल्टी की तली ही निकालने की व्यवस्था कर रही थी।
लेकिन, यह सिर्फ विदेशी मुद्रा संसाधनों या व्यापार में नफा-नुकसान का ही मामला नहीं है। अमेरिकी विदेश सचिव बलपूर्वक इसकी भी याद दिलाते हैं कि भारत को अमेरिका से पांच साल में जो 500 अरब डालर के मालों की खरीदारी करनी होगी, उसके केंद्र में 'ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और कृषि (उत्पाद) होंगे। याद रहे कि प्रौद्योगिकी के नाम पर भारत पर, रणनीतिक सहयोग के नाम पर रक्षा प्रौद्योगिकी से लेकर, नागरिक विमानों तथा नाभिकीय उपकरणों की जो बढ़ती हुई खरीद थोपी जा रही थी, उसे अगर हम फिलहाल छोड़ भी दें तो, ऊर्जा और कृषि, ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें अमेरिका से आयात न्यूनतम ही रहे हैं। वास्तव में कृषि के क्षेत्र में अमेरिका से आयातों से तो भारत बहुत ही सचेत रूप से अब तक बचता आ रहा था क्योंकि इसका सीधा असर करोड़ों किसानों पर पड़ेगा, जिनकी रोजी-रोटी इससे जुड़ी हुई है। हालांकि, अमेरिका से कृषि के क्षेत्र में क्या-क्या खरीदे जाने की तैयारी है, यह मोदी सरकार ने अपनी तरफ से अब तक सात पर्दों में छुपाकर रखा है, फिर भी अमेरिका से छुटपुट तौर पर आई जानकारियों से ऐसा लगता है कि मुख्य अनाज की फसलों को छोड़कर, सोयाबीन, सूरजमुखी, मक्का, ज्वार समेत, अनेक फसलों से लेकर मेवों तथा सेब तक के उत्पादक, करोड़ों भारतीय किसानों की आजीविका के लिए खतरा न्यौता जा रहा है।
और प्रकटत: जिस तेल संकट के नाम पर, तमाम देशवासियों पर देशभक्ति दिखाने के लिए कटौती की शर्त थोपी जा रही है, उसका मामला तो और भी विचित्र है। रूबियो की भारत यात्रा के दौरान ही वाशिंगटन से इसकी खबर आई, जो जाहिर है कि मोदी सरकार की छवि बचाने की खातिर मीडिया में दबा ही दी गयी, कि रूस से तेल खरीदने की मोहलत बढ़ाने की भारत की प्रार्थना को, ट्रम्प प्रशासन ने खारिज कर दिया है। अमेरिकी पाबंदियों के दबाव में ईरान से तेल खरीदना बंद करने के बाद, ट्रम्प के विशेष टैरिफ ने भारत को रूस से तेल खरीदने से भी हाथ खींचने के लिए मजबूर कर दिया। ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले के बाद ट्रम्प प्रशासन ने तेल की कीमतों को थोड़ा ठंडा करने कोशिश में, रूस से तेल खरीदने की फिर से इजाजत दी भी, तो वह सीमित समय के लिए ही थी, जिसे अब वापस ले लिया गया है।
दूसरी ओर, और भी विचित्र तरीके से, रूबियो ने दिल्ली के अपनी यात्रा के दौरान ही इसका भी ऐलान कर दिया कि वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति (वास्तव में उपराष्ट्रपति) अगले हफ्ते ही भारत यात्रा पर आ रही हैं। इशारा यह था कि भारत, अब वेनेजुएला का तेल खरीदे। याद रहे कि कुछ महीने पहले, अमेरिका ने अपने साम्राज्यवादी रंग दिखाते हुए, वेनेजुएला के निर्वाचित राष्ट्रपति, मादुरो और उनकी पत्नी का, फौजी धावा मारकर, राजधानी कराकस से अपहरण कर लिया था। उसके बाद से वेनेजुएला पर और खासतौर पर उसके तेल संसाधनों पर (दुनिया भर में दूसरा सबसे बड़ा ज्ञात तेल भंडार वेनेजुएला के पास ही है) अमेरिका और उसके द्वारा नियंत्रित कंपनियों का ही पूरा नियंत्रण है। कभी विकासशील दुनिया का अगुआ रहे भारत को, इस साम्राज्यवादी लूट में अपने हाथ काले करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है और कम से कम अब तक इसके कोई संकेत नहीं है कि मोदी राज की ओर से इस खेल में शामिल होने से किसी तरह से इंकार किया गया है। खैर! ट्रम्प और नेतन्याहू की मित्रता में मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में नैतिकता को तो छोड़ ही दिया है, लेकिन यह सब तो भारत पर बहुत महंगी ऊर्जा थोपे जाने का ही मामला होने वाला है, जिसकी कीमत जनता को और ज्यादा कटौतियों से चुकानी पड़ेगी।
*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका 'लोक लहर' के संपादक हैं।)*
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