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5,000 का 'लाइसेंस' और भ्रष्टाचार का 'वेटिंग स्केल' कब सुधरेगा बिहार का सिस्टम?



विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

पटना/​बेगूसराय। बिहार में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी और बेशर्म हो चुकी हैं, इसका एक और ज्वलंत प्रमाण बेगूसराय से सामने आया है।
एक अदना सा क्लर्क, जिसके पास जनता के काम को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है, वह खुद को व्यवस्था का 'मालिक' समझ बैठता है।

मामला बेगूसराय के सहायक नियंत्रक माप-तौल कार्यालय का है, जहाँ के लिपिक पुश्कर कुमार द्विवेदी को निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की टीम ने 5,000 रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों दबोच लिया।

​इस पूरी घटना का सबसे काला पक्ष यह है कि रिश्वत की यह मांग किसी बड़े टेंडर या अवैध काम को लीगल करने के लिए नहीं थी।
यह घूस सिर्फ एक छोटे व्यवसायी (उमेश साह) की दुकान के लाइसेंस के नवीनीकरण (Renewal) के लिए मांगी जा रही थी।
यानी एक आम नागरिक, जो कानून के दायरे में रहकर अपनी रोजी-रोटी कमाना चाहता है, उसे नियम सम्मत काम कराने के लिए भी सरकारी दफ्तरों में अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है।

​सोचने वाली बात यह है कि जो विभाग 'माप-तौल' (Weights & Measures) को सही रखने और जनता को ठगी से बचाने के लिए बनाया गया है, उसी विभाग के मुलाजिम खुद ईमानदारी को ठगने में लगे हैं। यहाँ ईमानदारी का पैमाना पैसों की गड्डियों से तौला जा रहा था।

​निगरानी ब्यूरो की मुस्तैदी काबिले-तारीफ, लेकिन...
​25 मई 2026 को डीएसपी पवन कुमार-II के नेतृत्व में धावादल ने जिस फुर्ती से इस जाल को बिछाया और आरोपी क्लर्क को उसके ही दफ्तर के केबिन से गिरफ्तार किया, वह निश्चित रूप से सराहनीय है।
यह कार्रवाई यह भरोसा दिलाती है कि यदि जनता आवाज उठाए, तो कानून अपराधियों की कॉलर तक पहुँचने में देर नहीं करता।

​लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक? 5,000 की यह घूस तो सिर्फ हिमशैल का एक सिरा (Tip of the iceberg) है। बिहार के ब्लॉक स्तर से लेकर जिला स्तर के दफ्तरों में बिना 'सुविधा शुल्क' के फाइलों का न सरकना एक अघोषित नियम बन चुका है।
एक अदने से क्लर्क की यह हिम्मत बताती है कि उसे या तो कानून का डर नहीं है, या फिर उसे लगता है कि 'टेबल के नीचे का खेल' इस सिस्टम का परमानेंट हिस्सा बन चुका है।
​सिस्टम को चाहिए सर्जरी, सिर्फ मरहम से काम नहीं चलेगा

​निगरानी ब्यूरो आरोपी को विशेष न्यायालय, भागलपुर के सामने पेश करेगी और आगे की कानूनी प्रक्रिया चलेगी। मुमकिन है कि आरोपी को सजा भी मिले।

लेकिन क्या इससे दफ्तरों की कार्यशैली बदलेगी?
​जब तक सरकारी सेवाओं को पूरी तरह से पारदर्शी, डिजिटल और मानव-हस्तक्षेप से मुक्त (Faceless & Paperless) नहीं किया जाएगा, तब तक 'पुष्कर कुमार द्विवेदी' जैसे भ्रष्ट तंत्र के मोहरे पैदा होते रहेंगे।
लाइसेंस रिन्यूअल जैसी बेसिक चीजों के लिए भी आम आदमी को बाबूगिरी के सामने घुटने टेकने पर मजबूर करना, सुशासन के दावों पर एक बड़ा तमाचा है।
​अंतिम प्रहार:
बेगूसराय की इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि बिहार में 'निगरानी' तो मुस्तैद है, लेकिन सरकारी विभागों की 'नियत' अभी भी बीमार है।
जनता को अब मौन तोड़ना होगा और उमेश साह की तरह भ्रष्टाचारियों को उनके सही मुकाम यानी जेल की सलाखों के पीछे पहुँचाने के लिए आगे आना होगा।

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