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सरकारी जनसंपर्क शहडोल के व्हाट्सएप्प चैनल पर राजनीतिक प्रचार जैसे पोस्ट से बढ़ा विवाद, निष्पक्षता पर उठे गंभीर सवाल


शहडोल। मध्यप्रदेश शासन के आधिकारिक जनसंपर्क विभाग शहडोल के व्हाट्सएप चैनल पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मुलाकात से संबंधित पोस्ट प्रसारित होने के बाद राजनीतिक एवं प्रशासनिक हलकों में बहस तेज हो गई है। इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं तथा सरकारी मंचों के राजनीतिक उपयोग को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
प्रसारित पोस्ट में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन एवं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की “सौजन्य भेंट” को प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया है। साथ ही दोनों नेताओं के बीच समसामयिक एवं संगठनात्मक विषयों पर चर्चा होने का उल्लेख भी किया गया है। चूंकि यह सामग्री शासन के आधिकारिक जनसंपर्क मंच से प्रसारित हुई बताई जा रही है, इसलिए लोगों के बीच यह चर्चा का विषय बन गया है कि क्या सरकारी प्रचार तंत्र का उपयोग राजनीतिक दल विशेष के प्रचार अथवा छवि निर्माण के लिए किया जाना उचित है।
जानकारों का कहना है कि जनसंपर्क विभाग का मुख्य उद्देश्य शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं, प्रशासनिक निर्णयों, विकास कार्यों एवं सार्वजनिक हित से जुड़ी सूचनाओं को जनता तक पहुंचाना होता है। ऐसे में यदि सरकारी मंचों पर राजनीतिक दलों या संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़ी सामग्री प्रसारित होती है, तो इससे शासन की निष्पक्षता पर प्रश्न उठ सकते हैं।
सामाजिक एवं राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारी संसाधनों और सरकारी संचार माध्यमों का उपयोग पूरी तरह तटस्थ एवं गैर-पक्षपातपूर्ण होना चाहिए। यदि किसी राजनीतिक दल को लाभ पहुंचाने या राजनीतिक छवि निर्माण के उद्देश्य से सरकारी प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाता है, तो यह प्रशासनिक मर्यादा एवं सेवा आचरण नियमों के विपरीत माना जा सकता है।
वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री प्रदेश के संवैधानिक पद पर हैं और उनके स्तर की राजनीतिक एवं प्रशासनिक मुलाकातें सार्वजनिक महत्व की हो सकती हैं, इसलिए जनसंपर्क विभाग द्वारा इस प्रकार की जानकारी साझा करना पूरी तरह अनुचित नहीं कहा जा सकता। हालांकि आलोचकों का तर्क है कि पोस्ट की भाषा एवं प्रस्तुति सरकारी सूचना से अधिक राजनीतिक प्रचार जैसी प्रतीत हो रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी सरकारी अधिकारी या विभाग द्वारा सरकारी संसाधनों का उपयोग राजनीतिक प्रचार के लिए किया जाना सिद्ध होता है, तो संबंधित अधिकारियों पर विभागीय जांच, कारण बताओ नोटिस, अनुशासनात्मक कार्रवाई, पद से हटाने, निलंबन अथवा सेवा आचरण नियमों के अंतर्गत दंडात्मक कार्यवाही की जा सकती है। यदि मामला चुनाव आचार संहिता के दौरान का हो, तो चुनाव आयोग द्वारा भी कड़ी कार्रवाई संभव है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि सरकारी पद एवं संसाधनों का दुरुपयोग भारतीय दंड संहिता, लोक सेवक आचरण नियम तथा चुनाव संबंधी प्रावधानों के अंतर्गत जांच का विषय बन सकता है। हालांकि किसी भी कार्रवाई से पहले यह साबित होना आवश्यक होता है कि संबंधित पोस्ट वास्तव में राजनीतिक प्रचार की श्रेणी में आता है तथा उसका उद्देश्य दल विशेष को लाभ पहुंचाना था।
इस पूरे मामले को लेकर नागरिकों एवं सामाजिक संगठनों द्वारा शासन से स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग भी उठने लगी है, ताकि भविष्य में सरकारी मंचों के उपयोग को लेकर किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न न हो।
फिलहाल इस संबंध में जनसंपर्क विभाग अथवा प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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