ज्ञान में जियें
ज्ञान का आचरण में उतरना भी आवश्यक है। जो ज्ञान आचरण में नहीं उतर पाता वह कंजूस के उस धन के समान ही है, जो तिजोरी में तो पड़ा है पर आवश्यकताओं की पूर्ति में कभी भी सहायक नहीं हो पाता है।
एक ज्ञानी और संसारी में यही फर्क है कि ज्ञानी मरते हुए भी हँसता है और संसारी जीते हुए भी मरता है। ज्ञान हँसना नहीं सिखाता, बस रोने के कारणों को मिटा देता है।
ज्ञानी इसलिए हर स्थिति में प्रसन्न रहता है क्योंकि वह जानता है कि जो मुझे मिला, वो कभी मेरा था ही नहीं और जो कुछ मुझसे छूट रहा है, वह भी मेरा नहीं है। संसारी इसलिए रोता है क्योंकि उसकी मान्यताओं में जो कुछ उसे मिला है उसी का था और उसी के बल पर मिला है। जो कुछ छूट रहा है, वह सदा सर्वदा उस पर अपना अधिकार मान कर बैठा है।
जीवन में अज्ञान से आसक्ति एवं आसक्ति से दुःखों का जन्म होता है। ज्ञानी वो व्यक्ति नहीं होता जो बहुत-सी बातें जानता है, बल्कि ज्ञानी तो होता है जो काम की बातें जानता है। ज्ञान एक ऐसी विलक्षण शक्ति है, जिसके आगे दुनिया की बड़ी से बड़ी ताकत को भी झुकना पड़ता है। ज्ञान को सदैव प्राप्त करते हुए और अधिक बढ़ाना होता है, नहीं तो पहले अर्जित किया ज्ञान भी धीरे-धीरे विलुप्त होता जाता है.
जीवन में समस्याओं का आना-जाना लगा रहता है और इनसे निपटने के लिए आवश्यक है ज्ञान। ज्ञान की सहायता से बड़ी-बड़ी समस्याओं को दूर किया जा सकता है। मनुष्यो के लिए ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि जिन लोगों के पास ज्ञान नहीं है, उनकी सभी इच्छाएं अधूरी रह जाती हैं और उनके दुख कभी समाप्त नहीं होते हैं। इसलिए ज्ञान बढ़ाने का प्रयास सदैव करते रहना चाहिए।