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कविता समाज में बहू और बेटे के प्रति भेदभाव पर सवाल उठाती है

यह पंक्तियाँ समाज में बहू और बेटे के प्रति अलग-अलग सोच और व्यवहार पर गहरी चोट करती हैं। कविता का भाव यही है कि अक्सर बेटों की गलतियाँ नज़रअंदाज़ कर दी जाती हैं, जबकि बहू से हर बात में पूर्णता की उम्मीद की जाती है। कवि ने मार्मिक तरीके से यह संदेश दिया है कि अगर बेटे को भी बहू की तरह ही कसौटी पर परखा जाए, तो समाज का नजरिया बदल सकता है।



कविता में दहेज, घरेलू हिंसा और समाज की दोहरी मानसिकता जैसे मुद्दों पर भी प्रकाश डाला गया है। प्रभावशाली पंक्तियाँ जैसे “डोली में लेकर गए थे, अर्थी पर वापस भिजवाई गई।” और “पर पौधे तो छोड़ो, बेटा तो तुम्हें भी पानी नहीं देता था।” समाज में व्याप्त भेदभाव को उजागर करती हैं।

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