आखिर किसान पर अत्याचार क्यों
10 दिनों में चौथी बार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए गए।
पहले ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी, फिर लगभग 90-90 पैसे और अब एक बार फिर पेट्रोल ₹2.61 व डीजल ₹2.71 महंगा कर दिया गया।
आज मध्यप्रदेश में पेट्रोल ₹116 प्रति लीटर और डीजल ₹100 प्रति लीटर के पार पहुंच चुका है।
यह सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उस आम आदमी की टूटी हुई उम्मीदों की कहानी है, जो हर सुबह मेहनत करके अपने परिवार का पेट भरने निकलता है।
सरकार कहती है देश आगे बढ़ रहा है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर किसका देश आगे बढ़ रहा है?
उस किसान का नहीं, जो खेत में दिन-रात पसीना बहाकर भी डीजल के बढ़ते दामों से अपनी फसल की लागत नहीं संभाल पा रहा।
उस मजदूर का नहीं, जिसकी आधी कमाई अब आने-जाने में खत्म हो रही है।
उस मध्यमवर्गीय परिवार का भी नहीं, जिसने बच्चों की पढ़ाई, घर का राशन और दवाइयों के बीच अपना बजट बनाना छोड़ दिया है।
पेट्रोल-डीजल के दाम सिर्फ गाड़ियों का खर्च नहीं बढ़ाते, बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर आग लगा देते हैं।
जब डीजल महंगा होता है, तो ट्रैक्टर चलाना महंगा होता है, खेत की सिंचाई महंगी होती है, माल ढुलाई महंगी होती है।
और जब माल ढुलाई महंगी होती है, तो सब्जी, दूध, दाल, आटा, तेल, सीमेंट, दवाइयां—हर जरूरी सामान आम आदमी की पहुंच से दूर होने लगता है।
आज हालात यह हैं कि गांव का किसान अपनी उपज का सही दाम नहीं पा रहा, लेकिन शहर का उपभोक्ता वही सामान दोगुने दाम पर खरीदने को मजबूर है।
बीच में सिर्फ टैक्स बढ़ रहे हैं और जनता की जेब खाली हो रही है।
सवाल यह भी है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कई बार नीचे आईं, तब जनता को राहत क्यों नहीं मिली?
क्यों हर बार टैक्स बढ़ाकर आम आदमी की जेब पर बोझ डाल दिया जाता है?
2014 में कहा गया था कि “अच्छे दिन आएंगे”।
लेकिन आज स्थिति यह है कि आम आदमी अपनी बाइक में पेट्रोल भरवाने से पहले दो बार सोचता है।
किसान ट्रैक्टर चलाने से डरता है।
युवा नौकरी ढूंढने से ज्यादा खर्चों का हिसाब लगाने में लगा है।
और गृहिणी हर महीने रसोई का बजट काट-काटकर घर चला रही है।
यह सिर्फ महंगाई नहीं, बल्कि आम जनता की सहनशक्ति की परीक्षा बन चुकी है।
देश का नागरिक टैक्स भी दे, महंगाई भी झेले, बेरोजगारी भी सहे और फिर भी सवाल न पूछे—क्या यही लोकतंत्र है?
भाजपा सरकार को जवाब देना होगा—
क्या यही “अच्छे दिन” हैं?
क्या विकास का मतलब सिर्फ जनता पर टैक्स का बोझ बढ़ाना है?
क्या आम आदमी सिर्फ चुनाव के समय याद आता है?
क्योंकि सच यही है—
जब पेट्रोल-डीजल महंगा होता है, तब सिर्फ गाड़ी नहीं रुकती…
गरीब का सपना रुकता है, किसान की उम्मीद रुकती है और मध्यमवर्ग का भविष्य धीरे-धीरे टूटने लगता है।