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बाजार की पहुँच अब हमारे संवेदना प्रबंधन तक जो हमारे सामाजिक व सहकारी ढांचे के कमजोरी का प्रदर्शन!!

कटरा /खुदागंज /शाहजहांपुर/बीसलपुर! लग रहा है भारतीय समाज की पहचान अब नये सिरे से बाजार बदल देने वाला है। पूजीवाद का महत्वपूर्ण मानव सभ्यता व उसकी सामाजिकता को इस हद तक बदल ने की संभावना पर ला पटक देगा, यह हमारे पूर्वजों ने कभी सोंचा भी न होगा।

यह हाल की ही तस्वीर है। वायरल है। लाजपत नगर की भीड़ में अब एक नई सेवा या स्टार्टअप चुपचाप जगह बना चुकी है। ₹149 प्रति घंटा देकर कोई आपका सामान उठाएगा, आपके लिए लाइन में खड़ा रहेगा, आपको मेट्रो तक छोड़ेगा, बैठने की जगह ढूँढ़ेगा, यहाँ तक कि आपके लिए कुर्सी भी लगा देगा। पहली नज़र में यह एक सुविधाजनक और ‘इनोवेटिव’ व्यवसाय लगता है। पर, थोड़ा ठहरकर देखें, तो यह हमारे समय के सामाजिक बदलाव की गहरी परतों को खोलता है।

महानगरीय जीवन की गति ने मनुष्य से उसका समय छीन लिया है। यह वही समय है जो कभी रिश्तों, संवाद और छोटे-छोटे साझा श्रम में खर्च होता था। अब वही समय एक वस्तु में बदल रहा है। इसे खरीदा और बेचा जा सकता है। यह केवल श्रम का लेन-देन नहीं, बल्कि जीवन की प्राथमिकताओं का पुनर्गठन है, जहाँ ‘स्वयं करना’ अब आवश्यक नहीं, ‘करवा लेना’ अधिक व्यावहारिक माना जा रहा है।

इस व्यवस्था का एक धवल पक्ष भी है। यह असंगठित क्षेत्र के अनेक युवाओं और श्रमिकों को आय का अवसर देती है। ‘गीग इकॉनमी’ के इस विस्तार ने रोजगार के नए रास्ते खोले हैं, जहाँ कौशल की परिभाषा भी बदली है। अब उपलब्धता, तत्परता और सेवा-भाव ही पूंजी बन गए हैं। शहर का अनौपचारिक श्रम अब अधिक दृश्य और संगठित रूप में सामने आ रहा है।

पर, इस बदलाव के भीतर एक असहज सवाल भी छिपा है। क्या हम सुविधा के नाम पर अपनी मानवीय क्षमताओं और संबंधों को धीरे-धीरे त्याग रहे हैं? जो काम कभी मित्रता, सहकार और सहज मानवीय संवेदना से पूरे होते थे, वे अब ‘सेवा’ और ‘शुल्क’ के दायरे में आ गए हैं। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, सांस्कृतिक भी है। यहाँ संबंधों की जगह लेन-देन ले रहा है।

आज का युवा वर्ग, विशेषकर शहरी मध्यवर्ग, अपने अर्जित धन के माध्यम से जीवन को अधिक ‘सुगम’ बनाना चाहता है। इसमें कोई बुराई नहीं है। पर, जब यह सुविधा एक मानसिकता में बदल जाती है (जहाँ हर असुविधा को पैसे से हल किया जा सकता है) तब यह प्रवृत्ति आत्मनिर्भरता को कमज़ोर करती है। धीरे-धीरे मनुष्य श्रम से दूर होता है। प्रतीक्षा से बचता है। और असुविधा को जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मानने की क्षमता खोने लगता है।

स्थिति यहाँ तक पहुँचती दिख रही है कि अब केवल सामान ढोने या लाइन में लगने के लिए ही नहीं, बल्कि भावनात्मक रिक्तता भरने के लिए भी लोग ‘हायर’ किए जा रहे हैं। यह संकेत और भी गहरा है। बाज़ार अब केवल हमारी ज़रूरतों का नहीं, हमारी संवेदनाओं का भी प्रबंधन करने लगा है।

इस बदलाव को केवल आलोचना या प्रशंसा के सरल खाँचों में नहीं रखा जा सकता। यह हमारे समय का जटिल यथार्थ है। जहाँ एक ओर अवसर हैं, तो दूसरी ओर मानवीय दूरी का विस्तार भी। सवाल यह नहीं कि यह व्यवस्था सही है या गलत; सवाल तो यह है कि इसके बीच हम अपने भीतर की संवेदना, श्रम के प्रति सम्मान और संबंधों की गरमाहट को कितना बचाए रख पाते हैं।

शायद चुनौती यही है। सुविधा और संवेदना के बीच संतुलन बनाए रखने की।

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