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उत्तर प्रदेश: कार्यकाल खत्म होने के बाद भी ग्राम प्रधानों के हाथ में रहेगी कमान, सरकार बनाएगी 'प्रशासक'

लखनऊ/बहराइच:
उत्तर प्रदेश की त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को लेकर राज्य सरकार ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लिया है। सरकार के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, ग्राम पंचायतों का पांच वर्ष का कार्यकाल समाप्त होने के बाद यदि किन्हीं कारणों से चुनाव में देरी होती है, तो गांवों का कामकाज नौकरशाही के हवाले नहीं किया जाएगा। इसके विपरीत, वर्तमान ग्राम प्रधानों को ही उनकी संबंधित पंचायतों का 'प्रशासक' नियुक्त किया जाएगा।
इस फैसले के बाद अब कार्यकाल समाप्त होने पर भी गांवों की कमान निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में ही कार्यवाहक के रूप में सुरक्षित रहेगी।

नौकरशाही के हस्तक्षेप पर लगेगी लगाम: इससे पहले की व्यवस्था के तहत, पंचायतों का कार्यकाल पूरा होते ही ग्राम प्रधानों के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार समाप्त हो जाते थे। ऐसी स्थिति में जिला प्रशासन द्वारा खंड विकास अधिकारी (BDO), सहायक विकास अधिकारी (ADO Panchayat) या ग्राम विकास अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया जाता था।

सरकारी अधिकारियों पर अत्यधिक कार्यभार होने के कारण गांवों के विकास कार्य ठप हो जाते थे और आम जनता को छोटे-छोटे कामों के लिए ब्लॉक के चक्कर काटने पड़ते थे। सरकार के इस नए कदम से नौकरशाही का हस्तक्षेप कम होगा और ग्रामीण स्तर पर लोकतंत्र की जड़ें मजबूत बनी रहेंगी।

विकास कार्यों को मिलेगी रफ्तार, वित्तीय अधिकार रहेंगे सुरक्षित: इस नए आदेश का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि संक्रमण काल (चुनाव होने तक की अवधि) में भी गांवों के विकास कार्य प्रभावित नहीं होंगे।

खातों का संचालन: ग्राम निधि के बैंक खातों के संचालन का अधिकार (जो प्रधान और सचिव के संयुक्त हस्ताक्षर से होता है) बाधित नहीं होगा।

स्थानीय मुद्दों का त्वरित समाधान: नाली, खड़ंजा, स्ट्रीट लाइट, सफाई व्यवस्था और पेयजल जैसे आवश्यक कार्य बिना किसी प्रशासनिक देरी के चलते रहेंगे।

मनरेगा कार्य: गांवों में चल रहे मनरेगा के तहत रोजगार और मजदूरी भुगतान की प्रक्रिया में कोई रुकावट नहीं आएगी।

यह व्यवस्था केवल अस्थायी: पंचायती राज विभाग के सूत्रों के अनुसार, यह एक पूर्णतः अस्थायी व्यवस्था होगी। ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार केवल तब तक के लिए सौंपे जाएंगे, जब तक कि राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा नए पंचायत चुनाव संपन्न कराकर नई कार्यकारिणी का गठन नहीं कर दिया जाता। नए प्रधानों के शपथ ग्रहण करते ही यह स्वतः समाप्त हो जाएगी।

सरकार के इस फैसले का प्रदेश के प्रधान संगठनों ने स्वागत किया है। उनका मानना है कि इस निर्णय से ग्रामीण विकास की निरंतरता बनी रहेगी और ग्रामीणों को अपनी समस्याओं के लिए अधिकारियों के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा।

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