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किसान आंदोलन के नाम पर छोटे किसानो के साथ बड़ा धोखा

आज किसानो के नाम पर हो रहे किसान आंदोलन ही छोटे किसानो के साथ बड़ा धोखा है। 

नए किसान कानून में धान के साथ साथ तिलहन, फल, सब्जी और अन्य फसलों पर भी न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करने की बात कही गयी है। साथ ही साथ कृषि उपज मण्डिओ को बिचौलियों से मुक्त कराने की बात एवं कृषि उपज से जुड़े उद्योग सीधे किसानो से करार कर उनकी उपज खरीद कर सकते है। साथ ही साथ छोटे किसानो को भी इसका लाभ मिले ऐसे प्रावधान नए कानून में है। 

फिर भी कुछ किसान संगठन इस कानून को किसान विरोधी बताकर पिछले सात महीनो से आंदोलन चला रहे। यह विरोध कुछ राज्यों के किसान नेता जिसमे हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश है। जहा बिचौलियों की अच्छी खासी कमाई बंध हो सकती है इस कानून के लगने से। 

वैसे भी केंद्र सरकार ने कानून पारित होने के बाद यह कहा है की अगर राज्य चाहे तो इसमें भी वह बदलाव कर सकते है यह अपनी इच्छा अनुसार कोई कानून बना सकते है। जब कानून इतना लचीला है फिर भी इसे किसान विरोधी क्यों बताया जा रहा है? कानून लागु करना न करना जब राज्य सरकार के दायरे में तो फिर आंदोलन दिल्ली में क्यों? और वैसे भी सर्वोच्च न्यायलय के हस्तक्षेप के बाद यह कानून अभी लागु नहीं है तो फिर आंदोलन क्यों?

क्यूंकि इस आंदोलन की बागडौर राकेश टिकैत, हनन मोल्लाह और योगेंद्र यादव जैसे कथित किसान नेताओ के हाथ में है। जिनका राजनीतिक अस्तित्व न के बराबर है और अपने आप को किसानो का नेता साबित करने के लिए विपक्षी दलों की कठपुतलिया बन गए है। सरकार के साथ 20 दौर की बातचीत के बावजूद इस कानून की किसी भी धारा में यह आज तक कोई कमी खुलकर नहीं बता पा रहे। इसका मतलब साफ़ है यह सिर्फ एक राजनीतिक विरोध है और बिचौलियों को बचाने के लिए यह सब नाटक है। 

अगर छोटे किसान भी अपनी फसल अपनी मर्जी से बेचने लगे तो इनका पूरा धंधा चौपट हो जायेगा और इनकी जरूरत नहीं रहेगी। इसीलिए इसका विरोध हो रहा है। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश जो आज तक किसी सरकार ने नहीं मानी थी उस पर वर्तमान सरकार काम कर रही है। जो कई राजनीतिक दलों को राज नहीं आ रही। 

आने वाले साल में गुजरात, पंजाब और उत्तर प्रदेश में चुनाव है। जहा विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं। इसलिए इन कानूनों पर भ्रामक प्रचार कर के किसानो के वोट हासिल करना ही इनका मकसद है। जिनको योगेंद्र यादव, राकेश टिकैत और हनन मोल्लाह जैसे किसान नेताओ का सहारा है। 

लोकतंत्र में आंदोलन करना सबका अधिकार है बशर्त इससे अन्य किसी व्यक्ति, समाज या देश  नुकसान न हो। आप इस इस तरह रास्ते रोक कर या दंगाई प्रवृति अपना कर अपनी बात नहीं मनवा सकते। यह आंदोलन बाकि राज्यों में क्यों नहीं हो रहा? क्यों सिर्फ कुछ जगहों पर ही हो रहा है?

बात साफ़ है। कोई नहीं चाहता की छोटे किसान समृद्ध हो और इन किसान नेताओ की जीहजूरी बंध हो। सब मामला राजनीतिक ही है। 

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