*श्रम संहिताएं लागू : अब राज्यों के सामने क्या विकल्प हैं?*
*(आलेख : के. एन. उमेश, अनुवाद : संजय पराते)*
*प्रकाशनार्थ*
*श्रम संहिताएं लागू : अब राज्यों के सामने क्या विकल्प हैं?*
*(आलेख : के. एन. उमेश, अनुवाद : संजय पराते)*
केंद्र की मोदी सरकार ने 8 मई, 2026 को चार श्रम संहिताओं को पूरी तरह से लागू कर दिया है, जिसके लिए 30 केंद्रीय नियमों को अधिसूचित किया गया है। कई राज्य सरकारें भी केंद्रीय नियमों के अनुरूप इन संहिताओं को लागू करने के लिए तैयार हैं। भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकारें 'डबल इंजन सरकार' होने के नाते इसे जल्द से जल्द लागू करने के लिए उत्सुक हैं। गैर-भाजपा शासित राज्य सरकारें भी राज्य नियमों के अंतिम मसौदों के साथ तैयार हैं, भले ही वे जनता के सामने केंद्रीय श्रम संहिताओं का विरोध कर रही हों।
एकमात्र राज्य सरकार, जिसने सैद्धांतिक रूप से इसका विरोध किया था और केंद्रीय श्रम संहिताओं के विकल्प विकसित करने के लिए कदम उठाए थे, वह केरलम की पिछली एलडीएफ सरकार थी। इसने 22 जनवरी, 2026 को सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, न्यायमूर्ति वी. गोपाल गौड़ा की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था, ताकि चारों श्रम संहिताओं का अध्ययन किया जा सके, उनमें संशोधन सुझाए जा सकें और मजदूरों के अधिकारों तथा उनके हितों की रक्षा व उन्हें आगे बढ़ाने के लिए राज्य-स्तरीय कानूनों की सिफारिश की जा सके। इस विशेषज्ञ समिति का गठन उन केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के सर्वसम्मत प्रस्ताव के आधार पर किया गया था, जिन्होंने 19 दिसंबर, 2025 को तिरुवनंतपुरम में केरलम सरकार द्वारा आयोजित 'श्रम संहिताओं पर राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन' में भाग लिया था। समिति ने 5 मार्च, 2026 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। राज्य विधानसभा चुनावों के लिए लागू आचार संहिता के कारण एलडीएफ सरकार समिति की सिफारिशों के आधार पर कोई कार्रवाई शुरू नहीं कर सकी।
समिति ने चारों श्रम संहिताओं की जाँच संविधान के नज़रिए से की, जिसमें विशेष ज़ोर प्रस्तावना और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में निहित सामाजिक और आर्थिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता पर था। इसने इन श्रम संहिताओं का मूल्यांकन इस आधार पर किया कि राज्य का यह दायित्व है कि वह सभी मजदूरों के लिए काम की न्यायसंगत और मानवीय स्थितियाँ, जीवन-निर्वाह योग्य मज़दूरी और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करे। इस समिति ने इस बात की गहन जाँच की थी कि ये श्रम संहिताएँ मौजूदा सुरक्षा उपायों को कमज़ोर करके और कार्य बल के कमज़ोर तबकों को पर्याप्त सुरक्षा देने में विफल रहकर, सामाजिक और आर्थिक न्याय की संवैधानिक परिकल्पना को किस तरह कमज़ोर करती हैं। इसने स्पष्ट रूप से कहा है कि ये श्रम संहिताएँ संविधान के अनुरूप नहीं हैं।
समिति के अनुसार, “ये श्रम संहिताएँ केवल संवैधानिक ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ना ही नहीं हैं, बल्कि ये बुनियादी सिद्धांतों से जान-बूझकर और सक्रिय रूप से हट जाना भी हैं। मज़दूरों के अधिकारों के रक्षक के तौर पर काम करने के बजाय, राज्य ने खुले तौर पर खुद को कॉर्पोरेट और नियोक्ता वर्ग के हितों के साथ जोड़ लिया है। समानता और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के बजाय, ये श्रम संहिताएँ ढाँचागत असमानताओं को और गहरा करती हैं, श्रम और पूँजी के बीच शक्ति के असंतुलन को और बढ़ाती हैं, और श्रम की उस गरिमा को कमज़ोर करती हैं, जिसकी गारंटी संविधान देता है। असल में, राज्य अधिकारों के रक्षक के तौर पर अपनी भूमिका से पीछे हट गया है, और इसके बजाय वह असमानता और शोषण को बढ़ावा देने वाला बन गया है।”
समिति ने श्रम संहिताओं में राज्य-स्तरीय संशोधनों की सिफ़ारिश की है, जिसमें धारा-वार विशिष्ट संशोधन शामिल थे। राज्य-स्तरीय संशोधनों के अतिरिक्त, समिति ने संविदा मजदूरों, असंगठित मजदूरों और सफ़ाई कर्मचारियों के हितों की रक्षा हेतु तीन विशिष्ट राज्य-स्तरीय विधानों की भी सिफ़ारिश की है। समिति ने संविदा मजदूरों के नियमितीकरण, अनौपचारिक मजदूरों के लिए सेवा शर्तों के निर्धारण — जिसमें सफ़ाई कर्मचारियों की सुरक्षा और कल्याण भी शामिल है — हेतु मसौदा विधेयक प्रस्तुत किए।
समिति ने कहा है कि राज्य विधानमंडलों को संवैधानिक रूप से यह अधिकार प्राप्त है कि वे मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए श्रम क्षेत्र से संबंधित केंद्रीय कानूनों में राज्य के स्तर पर संशोधन कर सकें, क्योंकि श्रम संबंधी मामले 7वीं अनुसूची के अंतर्गत 'समवर्ती सूची' में शामिल हैं।
ये सिफ़ारिशें उन संवैधानिक प्रावधानों पर आधारित हैं, जो श्रम मामलों पर कानून बनाने की व्यवस्था करते हैं, क्योंकि ये समवर्ती सूची की प्रविष्टियों 22, 23 और 24 के अंतर्गत आते हैं। प्रविष्टि 22 में ट्रेड यूनियन, औद्योगिक और श्रम विवाद शामिल हैं ; प्रविष्टि 23 में सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा, रोज़गार और बेरोज़गारी शामिल हैं ; और प्रविष्टि 24 में श्रमिकों का कल्याण शामिल है, जिसमें काम करने की स्थितियाँ, भविष्य निधि, नियोक्ता की जवाबदेही, श्रमिक मुआवज़ा, विकलांगता और वृद्धावस्था पेंशन तथा मातृत्व लाभ शामिल हैं।
संविधान का अनुच्छेद 246 विधायी शक्तियों को संघ (संसद) और राज्य विधानमंडल के बीच विभाजित करता है। अनुच्छेद 246(2) संसद और राज्य विधानमंडलों, दोनों को समवर्ती सूची में सूचीबद्ध विषयों पर कानून बनाने का अधिकार देता है ; बहरहाल, यह अधिकार 'विरोध के सिद्धांत' के अधीन है, जो केंद्रीय सर्वोच्चता के मार्ग में एक बड़ी बाधा के रूप में कार्य करता है। राज्य के कानून केंद्रीय कानूनों पर तब प्रभावी होते हैं, जब राष्ट्रपति उन्हें अपनी सहमति दे देते हैं और संविधान के अनुच्छेद 254(2) के अनुसार, राज्य के कानून प्रस्तावना और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के प्रकाश में मजदूरों के हितों की पूर्ति करते हैं।
सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा 161, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य-दशा संहिता की धारा 120, औद्योगिक संबंध संहिता की धारा 76 और मजदूरी संहिता की धारा 2(d) का मूल भाव यह है कि मजदूर उन लाभों और हकदारियों के अधिकारी हैं, जो उनके लिए अधिक अनुकूल हों और जहाँ भी वे उपलब्ध हों।
सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा 161 और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य-दशा संहिता की धारा 120 में यह प्रावधान है कि जहाँ, किसी अधिनिर्णय, करार, सेवा संविदा या अन्यथा के अधीन, कोई व्यक्ति ऐसे लाभों का हकदार है जो अधिक अनुकूल हैं। वाक्यांश "या अन्यथा" महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह इस प्रावधान का विस्तार संविदात्मक व्यवस्थाओं से आगे तक करता है, ताकि बेहतर लाभों के किसी भी स्रोत को इसमें शामिल किया जा सके — जिनमें राज्य विधान से उत्पन्न होने वाले लाभ भी शामिल हैं ; इस प्रकार, यह संहिता सुरक्षा के लिए एक 'न्यूनतम आधार' के रूप में कार्य करती है, न कि एक 'अधिकतम सीमा' के रूप में।
औद्योगिक संबंध संहिता की धारा 76, जो मजदूरों के उन अधिक अनुकूल लाभों के हक को सुरक्षित रखती है, उन राज्य कानूनों या साधनों के निरंतर संचालन की परिकल्पना करती है, जो बढ़ी हुई सुरक्षा प्रदान करते हैं, जो "किसी अन्य अधिनियम या नियमों, आदेशों या अधिसूचनाओं" के तहत या "अन्यथा" उपलब्ध हैं।
मजदूरी संहिता की धारा 2(d) में 'उपयुक्त सरकार' को इस तरह से परिभाषित किया गया है कि इसमें केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों को उपयुक्त सरकार माना गया है ; और यह संहिता न्यूनतम मजदूरी की दर तय करने का अधिकार उपयुक्त सरकार को प्रदान करता है।
इसलिए समिति ने कहा कि श्रम संहिताओं के दायरे में राज्य संशोधनों की गुंजाइश भी रखी गई है, और राष्ट्रपति को इन पर अपनी सहमति देनी होगी ; क्योंकि श्रम संहिताओं के अनुसार, राज्य संशोधन भी मूल प्रावधानों के विपरीत नहीं होने चाहिए।
*श्रम कानून की संवैधानिक संरचना मूल रूप से संघीय है -- एकात्मक नहीं*
समिति ने इस बात की पुष्टि की कि श्रम मामलों पर राज्य सरकारों के पास पर्याप्त विधायी और विनियामक अधिकार हैं, क्योंकि भारत में श्रम कानून की संवैधानिक संरचना मूल रूप से संघीय है, न कि एकात्मक। इसलिए, समिति ने 'राज्य की शक्ति' को एक लोकतांत्रिक सुरक्षा कवच के रूप में रेखांकित किया है और उसने यह अनुशंसा की है कि राज्य सरकारें ऐसे कानून और संशोधन ला सकती हैं, जो 'श्रम संहिताओं' के तहत निर्धारित न्यूनतम प्रावधानों से भी बढ़कर, मजदूरों को और अधिक अनुकूल लाभ, हकदारी और सेवा शर्तें प्रदान करें।
समिति के शब्दों में, “भारत के संवैधानिक लोकतंत्र में, संघवाद केवल एक प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक अनिवार्यता है। राज्य सरकारें केवल कानून लागू करने वाली एजेंसियां नहीं हैं, बल्कि स्वतंत्र विधायी क्षमता रखने वाले संवैधानिक प्राधिकार हैं। श्रम संहिताएं कोई अंतिम कानून नहीं हैं, बल्कि एक ऐसा प्रतियोगी क्षेत्र हैं, जहाँ मजदूरों के अधिकारों का भविष्य लोकतांत्रिक संघर्ष, विधायी नवाचार और संघीय वार्ताओं के माध्यम से तय होगा। जो राज्य अपनी संवैधानिक शक्तियों के प्रयोग करने का चुनाव करते हैं, वे यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि इन संहिताओं द्वारा निर्धारित न्यूनतम मानक ही अधिकतम सीमा न बन जाएं, और यह भी कि मजदूरों के अधिकारों का विस्तार हो, न कि उनमें कोई कटौती हो।”
भले ही जस्टिस गोपाल गौड़ा समिति की सिफ़ारिशें केरलम सरकार के लिए हैं, लेकिन वे देश की सभी राज्य सरकारों पर लागू होती हैं। वर्तमान नव-उदारवादी श्रम व्यवस्था के मौजूदा ढाँचे के भीतर, वैकल्पिक नीतिगत रास्तों पर ज़ोर देते हुए, विभिन्न रूपों में वामपंथी वैकल्पिक हस्तक्षेप के लिए संघर्ष को आगे बढ़ाने में इसकी सिफ़ारिशें अहम भूमिका निभाएँगी। केंद्र सरकार से श्रम संहिताओं को रद्द करने की माँग के साथ-साथ, राज्य सरकारों से राज्य-वार विशिष्ट संशोधनों की भी माँग की जानी चाहिए।
एक विशेषज्ञ समिति का गठन करके और उसकी सिफ़ारिशें हासिल करके, केरलम की तत्कालीन एलडीएफ सरकार ने एक ऐसा वैकल्पिक रास्ता दिखाया है, जो राज्य सरकारों के लिए संवैधानिक रूप से उपलब्ध है। मज़दूर-विरोधी और कॉर्पोरेट-समर्थक केंद्रीय श्रम संहिताओं को पूरी तरह से लागू करने या राज्य के नियमों के ज़रिए उनमें मामूली फेरबदल करने के बजाय, राज्य संशोधनों के माध्यम से उनके विरुद्ध वैकल्पिक श्रम संहिताएँ बनाई जा सकती हैं।
वैकल्पिक श्रम संहिताओं के लिए चल रहा आंदोलन — जो केरलम और देश भर में अन्य जगहों पर केंद्रीय श्रम संहिताओं में राज्य-स्तरीय संशोधनों की मांग कर रहा है — उस नव-उदारवादी श्रम व्यवस्था का विरोध करने और उसे चुनौती देने में निर्णायक साबित होगा, जिसे मोदी सरकार ने अपनी चार कठोर श्रम संहिताओं के माध्यम से लागू किया है।
*(लेखक सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस -- सीटू के राष्ट्रीय सचिव हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*
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