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बेगूसराय की एक बाप बेटी के साथ पटना की होटल में बड़ी लापरवाही । सुरक्षा पर उठी सवाल

अपराधी थर-थर कांप रहे हैं बिहार में यह दावा पटना की उस हवा में कहीं बिखर गया, जहां एक लाचार पिता की आंखों के सामने से उसकी कलेजे के टुकड़े को उठाने की सरेआम कोशिश की गई।

बेगूसराय का वह पिता, जो अपनी बेटी को सुरक्षित भविष्य देने के सपने लेकर निकला था, आज पटना के एक होटल के कमरे में अपनी बेबसी पर खून के आंसू रो रहा है।

सरकार और उसके नुमाइंदे एनकाउंटर की कहानियां सुनाकर अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त हैं, लेकिन कोई उस पिता से जाकर पूछे कि वह अपनी बेटी से नजरें कैसे मिलाएगा? उस बेटी से, जिसने अपने रक्षक, अपने पिता को अपराधियों के सामने गिड़गिड़ाते देखा। कानून का खौफ अपराधियों में नहीं, बल्कि उस आम इंसान के दिल में बैठ गया है जो अपनी सुरक्षा के लिए थाने की चौखट पर जाता है। जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ जाएं, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए?

अपराधियों को डराने का दावा करने वाली सरकार के राज में आज एक पिता अपनी ही बेटी के सामने अपराधी की तरह खड़ा है, क्योंकि वह उसकी अस्मत की रक्षा करने में खुद को असमर्थ पा रहा है। यह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि पूरे सूबे की मरती हुई कानून व्यवस्था का मरणोप्रलाप है।
लेकिन बिहार की राजधानी में जो हुआ, उसने खाकी और व्यवस्था के बचे-कुचे विश्वास को भी सरेबाजार नीलाम कर दिया। एफआईआर दर्ज कराने के बाद, मदद की उम्मीद में दिया गया पीड़ित का फोन नंबर पुलिस ने सीधे अपराधियों को सौंप दिया। अब वही अपराधी उस बेबस पिता को फोन पर धमका रहे हैं। जो लोग कल तक एनकाउंटर की खबरों पर तालियां बजा रहे थे, आज उनके मुंह पर ताले लटके हैं।
यह कैसी व्यवस्था है जहां पुलिस अपराधियों की मददगार और पीड़ितों की काल बन गई है? बेगूसराय के उस लाचार पिता का रोना, सत्ता के अहंकार पर सबसे बड़ा तमाचा है। बयानवीर सरकार की बड़ी-बड़ी बातें और जमीनी हकीकत के बीच की यह खाई अब आम जनता की जिंदगियों को लील रही है। जब राजधानी के होटलों में बेटियां महफूज नहीं हैं और पुलिस अपराधियों की डाकिया बन चुकी है, तो आम नागरिक खुद को पूरी तरह अनाथ महसूस कर रहा है। यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि बिहार में अपराधी नहीं, बल्कि न्याय और कानून थर-थर कांप रहे हैं।

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