अपने ही इलाके और अपने ही मुआशरे पर एक नज़र डालिए
कभी ठहर कर अपने आसपास देखिए
अपनी गलियों को, अपने मोहल्लों को, अपने गांवों और कस्बों को गौर से देखिए।
अपने ही इलाके और अपने ही मुआशरे पर एक नज़र डालिए…
कभी ठहर कर अपने आसपास देखिए…
अपनी गलियों को, अपने मोहल्लों को, अपने गांवों और कस्बों को गौर से देखिए।
क्या आपको महसूस नहीं होता कि हमारा समाज धीरे-धीरे एक ऐसी दिशा में बढ़ रहा है जहाँ रिश्तों की गर्माहट कम होती जा रही है, भरोसा टूटता जा रहा है, और नई नस्ल उलझनों, ग़लत आदतों और ग़लत रास्तों में भटकती जा रही है?
आज हर इंसान परेशान है।
माँ-बाप अपने बच्चों को लेकर परेशान हैं,
उस्ताद अपने छात्रों को लेकर परेशान हैं,
समाज अपने बिगड़ते माहौल को लेकर परेशान है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर इस बिगड़ती हुई हालत का ज़िम्मेदार कौन है?
क्या सिर्फ़ बच्चे?
क्या सिर्फ़ मोबाइल और इंटरनेट?
क्या सिर्फ़ सोशल मीडिया?
या फिर कहीं न कहीं हम सब भी इसके बराबर के हिस्सेदार हैं?
सच्चाई ये है कि दूसरों पर इल्ज़ाम लगाना बहुत आसान होता है।
हम अक्सर कहते हैं कि “आजकल के बच्चे बिगड़ गए हैं…”
लेकिन क्या हमने कभी ये सोचने की कोशिश की कि उन्हें सँभालने के लिए हमने क्या किया?
हमने अपने बच्चों को अच्छे कपड़े दिए,
महंगे मोबाइल दिए,
इंटरनेट दिया,
पैसे दिए,
लेकिन क्या हमने उन्हें वक़्त दिया?
क्या हमने कभी उनके दिल की बात सुनी?
क्या हमने कभी समझने की कोशिश की कि वो अंदर से किस परेशानी से गुज़र रहे हैं?
आज का बच्चा बाहर से मुस्कुराता हुआ दिखाई देता है,
लेकिन अंदर से टूट रहा होता है।
उसे दोस्त चाहिए,
समझने वाला चाहिए,
मार्गदर्शन चाहिए।
लेकिन अफ़सोस…
आज हर कोई अपनी दुनिया में इतना व्यस्त हो चुका है कि बच्चों की मानसिक और भावनात्मक ज़रूरतों को समझने का वक़्त ही नहीं बचा।
आज आए दिन ऐसी ख़बरें सुनने को मिलती हैं जो दिल को हिला देती हैं।
कोई लड़का किसी लड़की के साथ भाग गया,
कोई लड़की घर छोड़कर चली गई,
कहीं छोटी-सी बात पर तलाक हो गया,
कहीं नशे ने किसी नौजवान की ज़िंदगी बर्बाद कर दी,
कहीं मोबाइल और सोशल मीडिया ने बच्चों की सोच बदल दी,
कहीं ग़लत संगत ने एक अच्छे बच्चे को अपराध की राह पर डाल दिया।
लेकिन क्या ये सब अचानक हो जाता है?
नहीं…
ये सब धीरे-धीरे पैदा होने वाली लापरवाही का नतीजा होता है।
जब घरों में बातचीत कम हो जाती है,
जब माँ-बाप सिर्फ़ कमाने तक सीमित हो जाते हैं,
जब बच्चों की दोस्ती, उनका व्यवहार और उनकी मानसिक स्थिति पर ध्यान नहीं दिया जाता,
तब समाज में ऐसी समस्याएँ जन्म लेती हैं।
आज का दौर बहुत तेज़ी से बदल रहा है।
Artificial Intelligence (AI),
Technology,
Cyber World,
Digital Media —
ये सब आने वाले भविष्य की सच्चाई हैं।
अगर हम अपने बच्चों को सिर्फ़ पुरानी सोच में बाँध कर रखेंगे और उन्हें आधुनिक शिक्षा, तकनीक और नैतिकता के संतुलन के साथ तैयार नहीं करेंगे, तो वो इस प्रतिस्पर्धा भरी दुनिया में पीछे रह जाएंगे।
हमारा समाज आज भी कई जगहों पर सिर्फ़ दिखावे में उलझा हुआ है।
शादी-ब्याह में लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं,
दावतों में भीड़ जुटाई जाती है,
राजनीतिक बहसों में घंटों वक़्त बर्बाद किया जाता है,
लेकिन जब बात बच्चों की शिक्षा, करियर काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य, नशा मुक्ति, साइबर जागरूकता या नैतिक प्रशिक्षण की आती है, तो बहुत कम लोग आगे आते हैं।
हमने कितनी बार अपने गांव या मोहल्ले में ऐसा प्रोग्राम रखा जहाँ बच्चों को ये बताया जाए कि किशोरावस्था में होने वाले बदलाव क्या होते हैं?
कैसे भावनाओं को नियंत्रित किया जाता है?
कैसे सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल किया जाता है?
कैसे अपने करियर को सुरक्षित बनाया जाता है?
कैसे गलत दोस्ती और गलत संगत से बचा जाता है?
सच्चाई ये है कि हमने इन मुद्दों को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं।
आज एक और बहुत बड़ी समस्या हमारे समाज में बढ़ती जा रही है — नशा।
छोटी उम्र के बच्चे तंबाकू, शराब, नशीली दवाओं और दूसरे गलत पदार्थों की तरफ़ जा रहे हैं।
शुरुआत मज़ाक से होती है,
फिर आदत बन जाती है,
और धीरे-धीरे पूरी ज़िंदगी बर्बाद हो जाती है।
एक नशेड़ी सिर्फ़ अपनी ज़िंदगी खराब नहीं करता…
वो अपने परिवार की खुशियाँ भी छीन लेता है।
माँ-बाप की उम्मीदें टूट जाती हैं,
बहनों का भरोसा टूट जाता है,
समाज का संतुलन बिगड़ जाता है।
लेकिन सवाल फिर वही है —
क्या हमने नशा रोकने के लिए कोई सामूहिक प्रयास किया?
क्या हमने युवाओं के लिए खेल, शिक्षा, कौशल विकास या रोजगार के अवसर पैदा किए?
अगर नौजवानों को सही दिशा नहीं मिलेगी,
तो गलत रास्ते उन्हें बहुत जल्दी अपनी तरफ़ खींच लेंगे।
आज रिश्तों में भी बहुत बदलाव आ चुका है।
पहले परिवार साथ बैठते थे,
बातें होती थीं,
बुज़ुर्गों की सलाह सुनी जाती थी,
रिश्तों में सम्मान होता था।
आज हर इंसान मोबाइल में व्यस्त है।
एक ही घर में रहने वाले लोग भी दिल से दूर हो चुके हैं।
मोहब्बत कम हो रही है,
ग़ुस्सा बढ़ रहा है,
सब्र खत्म होता जा रहा है।
छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते टूट जाते हैं।
पति-पत्नी में समझदारी कम होती जा रही है।
माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद कमजोर हो रहा है।
हमें ये समझना होगा कि सिर्फ़ पैसा किसी समाज को बेहतर नहीं बनाता।
बेहतर समाज अच्छे संस्कार, अच्छी शिक्षा, आपसी सम्मान और सही मार्गदर्शन से बनता है।
अगर आज हम अपने बच्चों को सिर्फ़ डिग्री दिला देंगे लेकिन इंसानियत नहीं सिखाएंगे,
तो वो पढ़े-लिखे होकर भी समाज के लिए बोझ बन सकते हैं।
हमें अपने बच्चों को ये सिखाना होगा —
कि औरतों का सम्मान कैसे किया जाता है,
बड़ों की इज़्ज़त क्यों ज़रूरी है,
ईमानदारी क्या होती है,
मेहनत का महत्व क्या है,
और समाज के प्रति इंसान की ज़िम्मेदारी क्या होती है।
आज साइबर अपराध भी तेजी से बढ़ रहे हैं।
फर्जी कॉल,
ऑनलाइन फ्रॉड,
सोशल मीडिया ब्लैकमेल,
फर्जी पहचान,
डेटा चोरी —
ये सब नई पीढ़ी के सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं।
अगर बच्चों को साइबर सुरक्षा और डिजिटल जागरूकता नहीं दी जाएगी,
तो वो आसानी से गलत लोगों के जाल में फँस सकते हैं।
हमें स्कूलों, कॉलेजों और समाज में ऐसे जागरूकता अभियान चलाने होंगे जहाँ बच्चों को आधुनिक तकनीक के फायदे और नुकसान दोनों समझाए जाएँ।
समाज सिर्फ़ सरकार से नहीं बदलता।
सरकार सड़कें बना सकती है,
स्कूल खोल सकती है,
योजनाएँ ला सकती है,
लेकिन एक अच्छे इंसान की तर्बियत घर और समाज ही करता है।
अगर माँ-बाप अपने बच्चों को समय नहीं देंगे,
अगर उस्ताद सिर्फ़ किताबें पढ़ाएंगे और चरित्र निर्माण पर ध्यान नहीं देंगे,
अगर समाज सिर्फ़ आलोचना करेगा और समाधान नहीं देगा,
तो हालात कभी नहीं बदलेंगे।
हमें अपने गांवों और मोहल्लों में शिक्षा पर चर्चा करनी होगी।
युवाओं के लिए करियर मार्गदर्शन कार्यक्रम करने होंगे।
बच्चों के लिए खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियाँ बढ़ानी होंगी।
नशा मुक्ति अभियान चलाने होंगे।
महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान पर खुलकर बात करनी होगी।
मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लेना होगा।
सबसे ज़रूरी बात —
हमें अपने बच्चों का दोस्त बनना होगा।
डर और मार से बच्चे कुछ समय के लिए चुप हो सकते हैं,
लेकिन सही रास्ते पर तभी चलेंगे जब उन्हें प्यार, भरोसा और समझ मिलेगी।
आज भी वक्त है…
अगर हम अभी संभल जाएँ,
अगर हम अपने समाज को सुधारने के लिए ईमानदारी से कोशिश करें,
अगर हम नई नस्ल की तर्बियत पर ध्यान दें,
तो आने वाला भविष्य बेहतर हो सकता है।
लेकिन अगर हम आज भी सिर्फ़ तमाशा देखते रहे,
एक-दूसरे को दोष देते रहे,
और अपनी जिम्मेदारियों से भागते रहे,
तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी।
याद रखिए —
जब कोई बच्चा गलत रास्ते पर जाता है,
तो सिर्फ़ उसकी गलती नहीं होती।
कहीं न कहीं उसका परिवार,
उसका माहौल,
उसका समाज,
और हम सब भी उसके जिम्मेदार होते हैं।
इसलिए आज से शुरुआत कीजिए।
अपने बच्चों से बात कीजिए।
उन्हें समझिए।
उन्हें सही और गलत का फर्क सिखाइए।
उन्हें सिर्फ़ दुनिया में जीना नहीं,
बल्कि इज़्ज़त और इंसानियत के साथ जीना सिखाइए।
क्योंकि एक बेहतर समाज सिर्फ़ कानून से नहीं बनता…
उसे अच्छे इंसान मिलकर बनाते हैं।
— Dr Md Firoz Alam
General Physician
Director, Aleena Health Care Naraini
Member, AIMA Media
Member, Jamiat Ulama-e-Hind
Cybersecurity Volunteer
Member, All India Police Friends Organisation, New Delhi