न्यूज़ रिपोर्टर मोहित संघी
विकास की दौड़ में हरियाली पर संकट, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई बनी भविष्य के लिए खतरा
न्यूज़ रिपोर्टर मोहित संघी
विकास की दौड़ में हरियाली पर संकट, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई बनी भविष्य के लिए खतरा
देशभर में विकास कार्यों के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई लगातार चिंता का विषय बनती जा रही है। चौड़ी सड़कें, नई कॉलोनियां, इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट और शहरी विस्तार के बीच हरियाली तेजी से खत्म हो रही है। पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि समय रहते संतुलन नहीं बनाया गया तो आने वाले वर्षों में हालात और भयावह हो सकते हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार एक बड़ा पेड़ सालभर में लगभग 118 किलो ऑक्सीजन देता है और एक व्यक्ति को सालभर में पर्याप्त ऑक्सीजन के लिए करीब 4 पेड़ों की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद विकास परियोजनाओं में हजारों पेड़ों की बलि दी जा रही है, जबकि उनके बदले पर्याप्त और प्रभावी वृक्षारोपण नहीं हो पा रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि पेड़ों की कटाई के कारण शहरों में “हीट आइलैंड इफेक्ट” तेजी से बढ़ रहा है। कंक्रीट और डामर से भरे शहरों का तापमान आसपास के क्षेत्रों की तुलना में कई डिग्री अधिक हो चुका है। लगातार बढ़ती गर्मी और लू के हालात इसका बड़ा संकेत माने जा रहे हैं।
इसके अलावा भूजल स्तर में गिरावट, बाढ़, भूस्खलन और प्रदूषण जैसी समस्याओं के पीछे भी जंगलों की कटाई को अहम कारण माना जा रहा है। पेड़ बारिश के पानी को जमीन में रोकने और मिट्टी को बांधने का काम करते हैं। पेड़ कम होने से जल संरक्षण की प्राकृतिक व्यवस्था कमजोर पड़ रही है।
सामाजिक चिंतकों का कहना है कि विकास का विरोध नहीं है, लेकिन “अंधा विकास” निश्चित रूप से चिंता का विषय है। उनका आरोप है कि कई परियोजनाओं में “प्रतिपूरक वृक्षारोपण” केवल कागजों तक सीमित रह जाता है। वर्षों पुराने विशाल पेड़ों के बदले छोटे पौधे लगाकर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है।
पर्यावरणविदों ने सरकार और समाज दोनों की साझा जिम्मेदारी बताते हुए लोगों से अपील की है कि यदि उनके क्षेत्र में बिना उचित योजना के पेड़ों की कटाई हो रही हो तो वे जागरूक नागरिक के रूप में आवाज उठाएं। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर, संस्था या मोहल्ले में अधिक से अधिक पौधारोपण करने का संकल्प लेना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि विकास ऐसा होना चाहिए जिससे सड़कें भी बनें और आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध हवा भी मिल सके। क्योंकि यदि भविष्य में सांस लेने के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर की जरूरत पड़ जाए, तो विकास का वास्तविक अर्थ ही खत्म हो जाएगा।