झारखंड की जनता अब यही पूछ रही है
अगर सरकारी अस्पताल में भी गरीब सुरक्षित नहीं है, तो आखिर वह जाए कहां?
झारखंड की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था कागज़ों में “मुफ़्त इलाज” का दावा करती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में आम जनता कई तरह की परेशानियों, भ्रष्टाचार और अव्यवस्था से जूझ रही है। राज्य के कई सरकारी अस्पतालों में इलाज, जांच, दवा, बेड और प्रसव जैसी सुविधाओं के नाम पर गुप्त रूप से पैसे लेने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।
देवघर सदर अस्पताल का एक मामला हाल ही में चर्चा में आया, जहां प्रसव पीड़ा से जूझ रही महिला के परिजनों से अवैध वसूली का आरोप लगा। वीडियो वायरल होने के बाद पूरे मामले ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए।
इसी तरह चाईबासा सदर अस्पताल में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को कथित तौर पर HIV संक्रमित रक्त चढ़ाने का मामला सामने आया। झारखंड हाईकोर्ट ने इसे बेहद गंभीर लापरवाही माना और FIR दर्ज करने का आदेश दिया। इस घटना ने सरकारी अस्पतालों की जांच व्यवस्था, ब्लड बैंक सिस्टम और प्रशासनिक निगरानी की पोल खोल दी।
जमशेदपुर के MGM अस्पताल में भी इलाज के लिए भर्ती मरीज का शव संदिग्ध हालत में मिलने के बाद परिजनों ने लापरवाही और अव्यवस्था के आरोप लगाए।
जनता किन समस्याओं से जूझ रही है?
मुफ्त इलाज के बावजूद बाहर से दवा खरीदने की मजबूरी
बेड, स्ट्रेचर और ऑक्सीजन के लिए दलालों का दबाव
जांच जल्दी कराने के नाम पर “चाय-पानी” मांगना
प्रसव, पोस्टमार्टम और एम्बुलेंस तक में अवैध वसूली
गरीब मरीजों के साथ बदसलूकी और लंबा इंतजार
डॉक्टरों और नर्सों की भारी कमी
कई अस्पतालों में मशीनें बंद या खराब
गुप्त रूप से पैसे कैसे लिए जाते हैं?
कई मरीजों और उनके परिजनों का आरोप रहता है कि:
“फाइल आगे बढ़ाने” के नाम पर पैसा लिया जाता है
ICU या बेड दिलाने के लिए वार्ड बॉय और दलाल सक्रिय रहते हैं
मुफ्त दवा उपलब्ध होने के बावजूद बाहर की दुकान से दवा लिखी जाती है
ऑपरेशन या डिलीवरी जल्दी कराने के लिए अलग से रकम मांगी जाती है
हालांकि यह भी सच है कि सभी सरकारी डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी भ्रष्ट नहीं होते। सीमित संसाधनों, भारी भीड़ और स्टाफ की कमी के बीच कई डॉक्टर ईमानदारी से सेवा भी दे रहे हैं। लेकिन सिस्टम की कमजोर निगरानी और भ्रष्ट नेटवर्क की वजह से जनता का भरोसा लगातार टूट रहा है।
सबसे बड़ा सवाल
सरकार हर साल स्वास्थ्य व्यवस्था पर करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है, लेकिन गांवों और गरीब तबके के लोगों को आज भी:
समय पर इलाज नहीं मिलता,
मुफ्त सुविधा के लिए भी पैसे देने पड़ते हैं,
और कई बार लापरवाही जानलेवा साबित होती है।