ग्रामीण महिलाओं पर बैठकी टैक्स का बोझ, क्या ऐसे बचेगा हाट-बाज़ार?
रांची के धुर्वा स्थित शालीमार बाज़ार में इन दिनों एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्या सामने आ रही है। गांवों से आने वाली गरीब और मेहनतकश महिलाएँ, जो दातुन, साग-सब्ज़ी, लकड़ी, फूल-पत्ते और अन्य घरेलू सामान बेचकर अपना परिवार चलाती हैं, उनसे ज़मीन पर बैठने के लिए भी 30 से 50 रुपये तक वसूले जा रहे हैं।
यह रकम सुनने में भले छोटी लगे, लेकिन उन महिलाओं के लिए यह उनकी दिनभर की कमाई का बड़ा हिस्सा है, जो मुश्किल से 100 से 150 रुपये रोज़ कमा पाती हैं। ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर गरीब महिला विक्रेताओं पर इतना आर्थिक दबाव क्यों डाला जा रहा है?
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर खतरा
शालीमार बाज़ार जैसे हाट केवल खरीद-बिक्री की जगह नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यहां गांव की महिलाएँ अपनी मेहनत का सामान बेचकर घर चलाती हैं। अगर उन पर इसी तरह शुल्क का बोझ बढ़ता रहा, तो धीरे-धीरे छोटे विक्रेता बाजार छोड़ देंगे और पारंपरिक हाट-बाज़ार खत्म होने लगेंगे।
महिलाओं की मजबूरी का फायदा?
सबसे बड़ी चिंता यह है कि गरीब और अशिक्षित महिलाओं की मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है। जिन महिलाओं के पास पक्की दुकान नहीं है, वे सड़क किनारे या ज़मीन पर बैठकर सामान बेचती हैं। उनसे भी जबरन शुल्क लेना मानवता और सामाजिक न्याय दोनों पर सवाल खड़ा करता है।
प्रशासन और नगर निगम से सवाल
क्या नगर निगम और स्थानीय प्रशासन ने कभी इन महिलाओं की स्थिति को समझने की कोशिश की?
क्या गरीब महिला विक्रेताओं के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?
क्या इन हाट-बाज़ारों को बचाने के लिए कोई ठोस नीति बनाई जाएगी?
हमारी राय
गरीब ग्रामीण महिलाओं से इस तरह शुल्क वसूलना पूरी तरह अनुचित और संवेदनहीन व्यवस्था को दर्शाता है। प्रशासन को चाहिए कि छोटे और गरीब विक्रेताओं के लिए मुफ्त या बेहद कम शुल्क वाली व्यवस्था लागू करे। साथ ही हाट-बाज़ारों की पहचान और ग्रामीण महिलाओं की आजीविका बचाने के लिए विशेष योजना बनाई जाए।
यदि समय रहते इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले दिनों में पारंपरिक हाट-बाज़ार सिर्फ यादों में सिमट कर रह जाएंगे।
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“जो महिलाएँ गांव से शहर तक मेहनत लेकर आती हैं, उन्हें सम्मान मिलना चाहिए, बोझ नहीं।”
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