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इंसानी शरीर अधिकतम 35C से 40C तक का बाहरी तापमान आसानी से सहन कर सकता है.

👉इंसानी शरीर अधिकतम 35°C से 40°C तक का बाहरी तापमान आसानी से सहन कर सकता है, जिसके बाद शरीर का कुदरती कूलिंग सिस्टम दबाव में आ जाता है. विज्ञान के अनुसार, जब बाहरी वातावरण का पारा 50°C को पार कर जाता है, तो यह स्थिति सीधे तौर पर इंसानी जीवन के लिए घातक साबित होने लगती है.

▪️कितना तापमान झेल सकता है इंसान का शरीर? जानिए किस पॉइंट के बाद अंग देने लगते हैं जवाब.
विशेष रिपोर्ट:एडिटर इन चीफ(बदायूँ हर पल न्यूज़)

▪️देश के कई हिस्सों में गर्मी ने विकराल रूप धारण कर लिया है, जहां पारा 45°C से लेकर 50°C के करीब पहुंच रहा है.
ऐसे में हर किसी के जेहन में यह सवाल है कि आखिर हमारा शरीर कितनी गर्मी बर्दाश्त कर सकता है? वैज्ञानिकों और मेडिकल साइंस के नजरिए से समझें तो जानलेवा गर्मी का असर सिर्फ त्वचा झुलसने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह अंदरूनी अंगों को पूरी तरह ठप कर सकता है.

▪️अंदर और बाहर के तापमान का पूरा खेल.
गर्मी के विज्ञान को समझने के लिए शरीर के दो तरह के तापमान को समझना जरूरी है:
बाहरी तापमान (Environmental Temperature): यह वह तापमान है जो मौसम विभाग दर्ज करता है या जो हमें धूप में महसूस होता है.
भीतरी तापमान (Core Body Temperature): यह हमारे अंदरूनी अंगों जैसे दिल, लिवर, दिमाग और किडनी का तापमान होता है. एक स्वस्थ इंसान के शरीर का अंदरूनी तापमान हमेशा 36.5°C से 37.5°C (98.6°F) के बीच रहना चाहिए.

इंसान एक गर्म खून वाला स्तनधारी जीव है, जो 'होमियोस्टैसिस' (Homeostasis) नामक एक खास तंत्र से संचालित होता है. इसके तहत दिमाग का हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) हिस्सा बाहरी वातावरण के बदलते ही शरीर को ठंडा रखने के लिए तुरंत एक्टिव हो जाता है.

▪️शरीर का कूलिंग सिस्टम कैसे काम करता है?
जब बाहरी तापमान बढ़ता है, तो हाइपोथैलेमस त्वचा की तरफ रक्त प्रवाह बढ़ा देता है, जिससे शरीर में पसीना आने लगता है. हवा के संपर्क में आकर जब यह पसीना इवेपोरेट (भाप बनकर उड़ना) होता है, तो शरीर को अंदरूनी ठंडक मिलती है. अगर हवा सूखी हो और व्यक्ति लगातार पानी पी रहा हो, तो शरीर 45°C से 50°C तक की सूखी गर्मी को भी कुछ समय के लिए बर्दाश्त कर लेता है.

▪️असली विलेन: उमस और 'वेट बल्ब तापमान'.
सिर्फ धूप या गर्मी ही जानलेवा नहीं होती, बल्कि सबसे बड़ा खतरा हवा में मौजूद नमी (Humidity) से होता है. वैज्ञानिक इसे मापने के लिए 'वेट बल्ब तापमान' (Wet-Bulb Temperature) का इस्तेमाल करते हैं.

यदि बाहरी तापमान 46°C हो और उमस 50% पर पहुंच जाए, तो हवा में इतनी नमी होती है कि शरीर का पसीना सूखना बंद हो जाता है.
जब पसीना नहीं सूखता, तो शरीर का अपना एयर कंडीशनर (कूलिंग सिस्टम) पूरी तरह फेल हो जाता है और अंदरूनी तापमान तेजी से बढ़ने लगता है.

🔥40°C के बाद अंगों का फेल होना (Multi-Organ Failure).

चिकित्सकों के अनुसार, जब शरीर का अंदरूनी (Core) तापमान 40°C (104°F) या उससे ऊपर निकल जाता है, तो इंसान हीट स्ट्रोक का शिकार हो जाता है. इसके बाद शरीर के महत्वपूर्ण अंग एक-एक कर जवाब देने लगते हैं:

🧠दिमाग (Brain): अत्यधिक गर्मी के कारण दिमाग में सूजन आ सकती है. इससे मरीज गंदगोगान (Confusion) का शिकार होने लगता है, उसकी आवाज लड़खड़ाने लगती है और वह बेहोश हो सकता है.

🫀दिल (Heart): शरीर को ठंडा रखने की जद्दोजहद में दिल को बहुत तेजी से खून पंप करना पड़ता है. इससे हार्ट रेट खतरनाक स्तर तक बढ़ जाता है और हार्ट अटैक का खतरा पैदा हो जाता है.

किडनी और लिवर (Kidney & Liver): लगातार पसीना बहने और पानी की कमी (Dehydration) से रक्त गाढ़ा होने लगता है. खून गाढ़ा होने के कारण किडनियां टॉक्सिन्स को फिल्टर नहीं कर पातीं, जिससे किडनी पूरी तरह काम करना बंद कर सकती हैं.

कोशिकाएं (Cells - Denaturation): सबसे डरावना असर सेल्स पर होता है. 42°C के पार भीतरी तापमान जाते ही शरीर में मौजूद प्रोटीन उबलने यानी 'डी-नेचर' (Denature) होने लगते हैं. विज्ञान के अनुसार, यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कच्चे अंडे को उबालने पर वह अंदर से पूरी तरह जमकर ठोस हो जाता है. इसके बाद कोशिकाओं का ढांचा नष्ट हो जाता है और मौत बेहद करीब आ जाती है.

▪️मेडिकल साइंस के अनुसार गर्मी के तीन मुख्य चरण.
चिकित्सक गर्मी से होने वाली शारीरिक दिक्कतों को इन तीन स्टेजेस में बांटते हैं:

हीट क्रैम्प्स (Heat Cramps): मांसपेशियों में तेज ऐंठन, दर्द और अत्यधिक पसीना आना. यह पानी-नमक की कमी का शुरुआती इशारा है.

हीट एग्जॉशन (Heat Exhaustion): चक्कर आना, कमजोरी, सिरदर्द और स्किन का ठंडा व चिपचिपा होना. इस दौरान भीतरी तापमान 38°C से 39°C तक पहुंच जाता है.

हीट स्ट्रोक (Heat Stroke): यह एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी है. इसमें पसीना आना पूरी तरह बंद हो जाता है, त्वचा सूखी और लाल हो जाती है तथा व्यक्ति झटके खाकर बेहोश हो जाता है. तुरंत इलाज न मिलने पर कुछ ही घंटों में मौत संभव है.

▪️बचाव के लिए डॉक्टरों की जरूरी सलाह.
इस जानलेवा मौसम में खुद को सुरक्षित रखने के लिए Sir Ganga Ram Hospital की एक्सपर्ट डॉ. सोनिया रावत निम्नलिखित सावधानियों की सलाह देती हैं:

हाइड्रेटेड रहें: प्यास न लगने पर भी हर आधे घंटे में पानी, नींबू पानी, छाछ या ORS का घोल पीते रहें.

समय का ध्यान रखें: दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे के बीच सीधे धूप में निकलने से पूरी तरह बचें.

पहनावा: हल्के रंग के, ढीले-ढाले और सूती (कॉटन) कपड़े पहनें ताकि हवा आसानी से पास हो सके और पसीना सूख सके.

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