जनता दरबार की सार्थकता
आश्वासनों के घेरे से ऑन-द-स्पॉट समाधान तक
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
गया: बिहार के प्रशासनिक हलकों में 'जनता दरबार' केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि आम आदमी और व्यवस्था के बीच सीधे संवाद का सबसे सशक्त माध्यम रहा है।
हाल ही में गया समाहरणालय में जिलाधिकारी श्री शशांक शुभंकर की अध्यक्षता में आयोजित जनता दरबार इसी कड़ी का एक और महत्वपूर्ण अध्याय है।
100 से अधिक फरियादियों की मौजूदगी और मौके पर ही समस्याओं के निष्पादन (ऑन द स्पॉट निवारण) का दावा यह दर्शाता है कि जिला प्रशासन निचले स्तर पर सुशासन की कड़ियों को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।
प्रशासनिक सक्रियता और प्राथमिकताओं का आईना
इस जनता दरबार में आए मामलों की प्रकृति पर गौर करें, तो यह स्पष्ट होता है कि आम जनता आज भी किन मूलभूत संकटों से जूझ रही है:
भूमि विवाद और आवास योजना:
ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में जमीन से जुड़े विवाद और प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री आवास योजना में होने वाली देरी आज भी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है।
सामाजिक सुरक्षा:
पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और मुआवजे से जुड़े मामलों का जनता दरबार तक पहुँचना यह दर्शाता है कि प्रखंड (ब्लॉक) स्तर पर कहीं न कहीं कोई 'लूपहोल' है, जिसके कारण लोगों को जिला मुख्यालय तक का सफर तय करना पड़ता है।
जिलाधिकारी द्वारा संबंधित पदाधिकारियों को "त्वरित एवं निष्पक्ष निपटारा" सुनिश्चित करने का निर्देश देना एक स्वागत योग्य कदम है।
समयबद्ध समाधान (Time-bound resolution) की बात कहकर उन्होंने यह साफ कर दिया है कि फाइलों को दबाकर बैठने की संस्कृति अब नहीं चलेगी।
विश्लेषण:
क्या वाकई बदल रही है जमीनी हकीकत?
जनता दरबार की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं आंकी जा सकती कि एक दिन में कितने आवेदन प्राप्त हुए, बल्कि इस बात से तय होती है कि उन आवेदनों का 'फॉलो-अप' (Follow-up) कितना मजबूत है।
एक गंभीर पहलू: यदि 100 से अधिक लोग अपनी बुनियादी समस्याओं (जैसे पेंशन या शिक्षा) के लिए जिलाधिकारी के सामने गुहार लगा रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर ब्लॉक और पंचायत स्तर के अधिकारियों की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़ा करता है।
आम जनता को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए जिला मुख्यालय न दौड़ना पड़े, इसके लिए 'विकेंद्रीकृत समाधान' (Decentralized Resolution) को और मजबूत करना होगा।
आगे की राह:
कैसे बने यह व्यवस्था और अधिक प्रभावी?
प्रशासन को "ऑन द स्पॉट" निवारण के इस मॉडल को और अधिक पारदर्शी और परिणामोन्मुखी बनाने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देना होगा:
डिजिटल ट्रैकिंग :
जनता दरबार में आए हर आवेदन को एक यूनिक टोकन नंबर दिया जाए, जिससे फरियादी घर बैठे अपने आवेदन की स्थिति (Status) देख सके।
जवाबदेही तय हो:
यदि जिलाधिकारी के निर्देश के बाद भी कोई विभागीय पदाधिकारी तय समय सीमा के भीतर मामले का निस्तारण नहीं करता, तो उन पर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।
ब्लॉक स्तर पर कड़ाई:
ज़िला पदाधिकारी को महीने में कम से कम एक बार खुद किसी सुदूर प्रखंड में जाकर औचक जनता दरबार लगाना चाहिए, ताकि स्थानीय स्तर के अधिकारियों में जवाबदेही का डर बना रहे।
निष्कर्ष:
गया जिलाधिकारी श्री शशांक शुभंकर की यह पहल सराहनीय है और यह जनता के भीतर प्रशासन के प्रति विश्वास को पुनर्जीवित करती है।
लेकिन मूल संदेश यही है कि जनता दरबार का आयोजन महज एक 'इवेंट' न बनकर रह जाए, बल्कि यह सुशासन का एक ऐसा 'सिस्टम' बने जहाँ आखिरी कतार में बैठे व्यक्ति को भी लगे कि उसकी सुनवाई हो रही है।
देखना दिलचस्प होगा कि इस जनता दरबार में दिए गए कड़े निर्देशों का असर आने वाले दिनों में गया की जमीनी हकीकत पर कितना दिखाई देता है।