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आर्थिक संकट की आहट एवं संवैधानिक उपचार

डॉ० आर०सी०तिवारी
प्रयागराज। भारत की अर्थव्यवस्था इस समय कई चुनौतियों से जूझ रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की आपूर्ति पर उसके असर ने सरकार और विपक्ष के साथ आम जनता को चिंतित कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल के भाषणों में जनता से ईंधन की बचत करने, खाद्य तेल का कम उपयोग करने, अनावश्यक विदेश यात्राएं रोकने और सोने की व्यर्थ खरीदारी घटाने की अपील की है। उन्होंने घर से काम करने, विद्युत वाहनों को बढ़ावा देने पर भी ज़ोर दिया।
उल्लेखनीय है कि भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, खाद्य तेल, सोना और उर्वरक एवं अन्य आवश्यक वस्तुएं विदेश से आयात करता है। आयातों एवं निर्यातों के मध्य असंतुलन विदेशी मुद्रा भंडार और भारतीय मुद्रा वैल्यू दोनों पर दबाव डाल रहा है। इसलिए सरकार बचत और आत्मनिर्भरता को बहुत ज़रूरी मान रही है।
दूसरी तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चेतावनी दी है कि आने वाले महीनों में देश गंभीर आर्थिक मुश्किलों में फंस सकता है। उनका कहना है कि महंगाई, बेरोज़गारी और आर्थिक असमानता का सबसे ज़्यादा बोझ आम लोगों, किसानों, मज़दूरों और छोटे व्यापारियों पर पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नीतियों का लाभ सिर्फ़ बड़े उद्योगपतियों तक ही पहुंच रहा है।
इन हालातों के बीच आर्थिक आपातकाल की चर्चा तेज़ हो गई है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 360 में इसका प्रावधान है। यदि राष्ट्रपति को लगे कि देश की वित्तीय स्थिरता या साख पर संकट उत्तपन्न हो गया है तो वे आर्थिक आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं। इस घोषणा को 60 दिन के भीतर संसद की मंजूरी मिलना ज़रूरी होती है।
आर्थिक आपातकाल लागू होने पर केंद्र सरकार की शक्तियों में वृद्धि हो जाती हैं। राज्यों को वित्तीय अनुशासन का पालन करने के निर्देश दिए जा सकते हैं। राज्यों के वित्तीय निर्णयों पर केंद्र का नियंत्रण मज़बूत हो सकता है। सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों और न्यायाधीशों के वेतन और भत्तों में कटौती भी की जा सकती है। राज्यों के धन संबंधी विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए रोका जा सकता है।
भारत के इतिहास में अब तक कभी आर्थिक आपातकाल नहीं लगा है। राष्ट्रीय आपातकाल और राष्ट्रपति शासन कई बार लगा, लेकिन आर्थिक आपातकाल की नौबत कभी नहीं आई।
हमारी शासन व्यवस्था संसदीय प्रणाली पर टिकी है। संविधान के अनुसार राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं। इसलिए यदि कभी यह घोषणा होती है तो वास्तविक निर्णय प्रधानमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद ही लेगा। राष्ट्रपति सिर्फ़ औपचारिक घोषणा करेंगे।
वैसे जनता के सेवक कहे जाने वाले जनता से निर्वाचित समस्त सदस्यों के पेंशन एवं भत्तों में यदि कटौती कर ली जाए तो शायद सामान्य जनता से अपील की जाने वाली कुछ एक समस्याओं का समाधान संभव है। जब सामान्य जनता मात्र ₹200 में पूरे 1 महीने अपने संचार व्यवस्था को बहाल कर सकता है तो माननीय निर्वाचित समस्त सदस्यों को संचार के मद में ₹200 से अधिक का भत्ता अनुमन्य करना कहीं से तार्किक एवं नैतिक नहीं लगता। इसी प्रकार यदि एक ऐसा सरकारी सेवक जो अपने जीवन का 30 से 40 वर्ष सरकार की सेवाओं में रहता है और उसे सामाजिक सुरक्षा के रूप में पेंशन देना उचित नहीं लगता है तो चंद दिनों के लिए निर्वाचित सदस्यों को, जितनी बार निर्वाचित होते हैं उतनी बार पेंशन देना किसी भी तरह से तार्किक एवं नैतिक नहीं है ।यदि उनकी पेंशन भत्ते पर उचित तरीके से प्रतिबंध लगाया जाए तो शायद देश इस वर्तमान आर्थिक संकट से थोड़ा उबर सकता है।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत आर्थिक आपातकाल की ओर बढ़ रहा है। चुनौतियां ज़रूर हैं-बढ़ता तेल आयात खर्च, रुपये पर दबाव और वैश्विक अस्थिरता। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है और सरकार स्थिति को संभालने की कोशिश कर रही है। फिर भी देश के नागरिकों को सतर्क रहना चाहिए।
लोकतंत्र में जनता को सरकार की आर्थिक नीतियों पर नज़र रखनी चाहिए और पारदर्शिता तथा अपनी भागीदारी की मांग करनी चाहिए। किसी भी आर्थिक संकट का स्थायी हल कठोर नियंत्रण या आपातकाल से नहीं, बल्कि दूरदर्शी नीतियों, सही सुधारों और जनता के विश्वास से ही निकलता है।

डॉ० आर०सी०तिवारी

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