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अंतर्ज्ञान,,,हम सब अपने जीवन के बड़े निर्णय अक्सर बाहरी शोर,,,,

के आधार पर कर लेते हैं, लोग क्या कहेंगे समाज क्या सोचता है, अभी क्या ट्रेंड में है। लेकिन इन सबके बीच एक धीमी आवाज भीतर भी बोलती है या यूं कहें बोलती रहती है। यह आवाज बहुत तेज नहीं होती है, इसलिए अक्सर अनसुनी रह जाती है।यह वही सूक्ष्म संकेत है जो हमें बताता है कि क्या सही लग रहा है और क्या नहीं। जब हम इसे दबाते हैं तो बाहर सब ठीक होते हुए भी भीतर बेचैनी बढ़ती जाती है। भीतर की यह आवाज तर्क से नहीं, संवेदना से जुड़ी रहती है।यह भविष्य की गारंटी तो नहीं देती, लेकिन दिशा का संकेत अवश्य देती है। जो इस आवाज को सुनना समझना सीख लेता है उसके निर्णय शांत और सुसंगत होते जाते हैं।

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