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विश्वविद्यालय संस्कृत एवं दर्शनशास्त्र विभाग द्वारा 'योगदर्शन की प्रासंगिकता' पर राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित

विश्वविद्यालय संस्कृत एवं दर्शनशास्त्र विभाग द्वारा 'योगदर्शन की प्रासंगिकता' पर राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर संस्कृत एवं दर्शनशास्त्र विभाग के संयुक्त तत्वावधान में "योगदर्शन की प्रासंगिकता" विषय पर पीजी संस्कृत विभाग में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ शिवानन्द झा की अध्यक्षता में किया गया, जिसमें मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो पुनीता झा-उद्घाटन कर्ता, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के दर्शन विभागाध्यक्ष डॉ धीरज कुमार पांडे- मुख्य वक्ता, संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ कृष्णकान्त झा- सम्मानित वक्ता, संस्कृत-प्राध्यापक डॉ आर एन चौरसिया-विशिष्ट वक्ता, कल्पना प्रधान- छात्र वक्त, जिग्नेश कुमार एवं ईशान- संचालन कर्ता, डॉ ममता स्नेही- स्वागत कर्ता तथा डॉ मोना शर्मा- धन्यवाद कर्ता के साथ ही दर्शनशास्त्र-प्राध्यापक डॉ संजीव कुमार साह एवं डॉ प्रियंका राय, डीवीकेएन कॉलेज, नरहन से संस्कृत-प्राध्यापिका डॉ कुमारी पूनम राय आदि ने विचार रखा। इस अवसर पर शोधार्थी- रितु कुमारी, रवीन्द्र कुमार, कुमकुम कुमारी, भारती कुमारी आदि सहित अनेक शिक्षक, कर्मचारी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। अतिथियों का स्वागत पाग, चादर एवं पुष्पगुच्छ से किया गया।
दीप प्रज्वलित कर संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो पुनीता झा ने कहा कि योग हमें भौतिक दुनिया से मिली हर परेशानियों तथा निराशाओं से शांति की ओर ले जाता है। योग स्वस्थ जीवन के लिए अति आवश्यक है। विशिष्ट वक्ता डॉ आर एन चौरसिया ने कहा कि योग एक बेहतरीन जीवन-पद्धति है जो हमें आदर्श जीवन जीने की कला भी सिखाता है, जिसके द्वारा नश्वर शरीर को स्वस्थ रखते हुए चंचल मन पर नियंत्रण भी पाया जा सकता है। योगदर्शन आत्म-जागरूकता, आंतरिक शांति तथा अर्थपूर्ण जीवन की ओर मार्गदर्शन प्रदान करता है, जिससे स्व-अनुशासन, आत्म- निरीक्षण तथा उत्तरदायित्व-बोध होता है। कहा कि योग सिर्फ सिद्धांत की बात नहीं, अपितु इसे जीवन में उतारने की जरूरत है। आज के भाग-दौड़ भरे जीवन में योग से तन स्वस्थ और मन प्रसन्न रखा जा सकता है। योग को अपनाकर युवा अपने चरित्र का बेहतर निर्माण तथा सर्वांगीण विकास कर सकते हैं।
सम्मानित वक्ता डॉ कृष्णकान्त झा ने कहा कि योग अनादि काल से प्रचलित है। आधुनिक काल में तनाव एवं डिप्रेशन आदि मानसिक समस्याओं के नियंत्रण में योगाभ्यास और ध्यान साधना उपयोगी है। योगदर्शन से पूर्व भी योग प्रचलित था। उन्होंने कहा कि सांख्य और योग एक ही दर्शन हैं। भगवद्गीता के अनुसार संख्य और योग को पृथक् मानने वाले तो बच्चे हैं।
मुख्य वक्ता डॉ धीरज कुमार पांडे ने कहा कि दुःख त्रय सभी दर्शन के आदि प्रवर्तक हिरण्गर्व हैं। आत्यंतिक निवृत्ति ही योग की प्रासंगिकता है। फिजियोथैरेपी भी योग का पाठ है। अष्टांग योग को जीवन में अपनाना ही योग की प्रासंगिकता होती है। उन्होंने अष्टांग योग का विस्तार से चर्चा किया। अध्यक्षीय संबोधन में डॉ शिवानन्द झा ने कहा कि संस्कृत के ज्ञान के बिना दर्शन का ज्ञान अधूरा है। योग का अर्थ जुड़ना भी है। उन्होंने कहा कि छात्रों को अपने अध्ययन से जुड़कर लक्ष्य प्राप्त करना भी योग की प्रासंगिकता है।
छात्र-वक्ता कुमारी कल्पना प्रधान ने कहा कि योगदर्शन की व्याख्या सृष्टि उत्पत्ति विषय वेद से संबंधित है। आधुनिक समय में योगदर्शन की प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार रखा।

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