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" दफ्तरों से भागते भ्रष्टाचारी और रेंगती हुई व्यवस्था"



विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

पटना: ​बिहार के जहानाबाद जिले के मखदुमपुर से आई एक ख़बर महज़ एक स्थानीय खबर नहीं है,
बल्कि यह हमारे समूचे प्रशासनिक तंत्र के सड़ चुके चेहरे का जीवंत 'एक्स-रे' है।

खबर कहती है कि जब मखदुमपुर के माननीय पूर्व विधायक सतीश दास 'नाजायज राशि' (रिश्वत) की शिकायत पर अचानक प्रखंड संसाधन केंद्र (BRC) पहुंचे, तो दफ्तर में 'अफरा-तफरी' मच गई।
आरोपी बाबू और नुमाइंदे काम छोड़कर ऐसे भागे मानो कोई डकैत पुलिस को देखकर भागता है।

​यह दृश्य जितना हास्यास्पद है, लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उतना ही शर्मनाक भी है।

​शिक्षा के मंदिर की चौखट पर 'दलाली' का खेल,
​सोचिए, जो शिक्षक समाज का निर्माण करते हैं, वे खुद अपने ही विभाग के बाबुओं के सामने असहाय और ठगे जा रहे हैं।
मामला क्या था? महज़ 'सेवा पुस्तिका' (Service Book) जमा करने का।
एक ऐसा सरकारी दस्तावेज, जिसे संभालना और समय पर अपडेट करना दफ्तर में बैठे क्लर्कों और लेखापालों की आधिकारिक जिम्मेदारी है।
लेकिन इस सिस्टम ने हर जिम्मेदारी की एक 'कीमत' तय कर रखी है।
जब तक टेबल के नीचे से 'नाजायज राशि' का पहिया नहीं घूमेगा, तब तक राष्ट्र निर्माताओं की फाइलें आगे नहीं सरकेंगी।
यह सीधे तौर पर मानसिक और आर्थिक शोषण है।

​विधायक को देखते ही क्यों छूटे पसीने?
​जैसे ही विधायक सतीश दास ने दफ्तर में कदम रखा, तथाकथित लोक सेवक 'भगोड़े' बन गए।

यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी की पूरी दाल ही काली है। अगर इन कर्मचारियों का दामन साफ था, तो वे जनप्रतिनिधि के सवालों का सामना करने के बजाय दफ्तर की खिड़कियों और दरवाजों से क्यों भाग खड़े हुए?
यह भगदड़ चीख-चीख कर कह रही है कि इन्हें कानून का डर नहीं है, इन्हें डर सिर्फ इस बात का है कि आज इनका 'धंधा' रंगे हाथों पकड़ा गया है।

​स्पष्टीकरण और तबादला: क्या यही न्याय है?
​घटना के बाद ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर (BEO) ने लेखापाल से स्पष्टीकरण मांगा और आरोपी शिक्षक की बीआरसी से प्रतिनियुक्ति रद्द कर दी।
प्रशासनिक भाषा में इसे 'कार्रवाई' कहते हैं, लेकिन व्यावहारिक भाषा में यह सिर्फ लीपापोती है।
एक भ्रष्ट मानसिकता वाले कर्मचारी को एक दफ्तर से हटाकर स्कूल भेज देना समस्या का समाधान नहीं है।

सवाल यह है कि क्या गारंटी है कि वह स्कूल जाकर बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करेगा?
क्या गारंटी है कि उसकी जगह जो नया लेखापाल आएगा, वह नया रेट कार्ड लेकर नहीं बैठेगा?
​सिस्टम कब तक 'औचक निरीक्षण' के भरोसे रहेगा?

​विधायक सतीश दास का यह कदम निश्चित रूप से सराहनीय है।
उन्होंने जनहित में त्वरित एक्शन लिया।
लेकिन इस घटना ने एक बड़ा यक्ष प्रश्न छोड़ दिया है: क्या बिहार या देश का प्रशासनिक अमला तब तक ईमानदारी से काम नहीं करेगा, जब तक कोई विधायक या मंत्री डंडा लेकर उनके सिर पर न खड़ा हो जाए?
आम जनता, गरीब शिक्षक और सीधे-सादे नागरिक रोज़ इन दफ्तरों के चक्कर काटते हैं, चप्पलें घिसते हैं और अंततः हारकर अपनी गाढ़ी कमाई इन 'जोकों' के हवाले कर देते हैं।
हर दफ्तर में रोज़ विधायक औचक निरीक्षण नहीं कर सकते।

​अंतिम प्रहार:
मखदुमपुर की यह घटना एक सबक है।
सरकार को डिजिटल पारदर्शिता और सख्त दंडात्मक कार्रवाइयों के जरिए इन बाबुओं की 'टेबल संस्कृति' को खत्म करना होगा।
भ्रष्टाचारियों का तबादला नहीं, बल्कि उन्हें सीधे निलंबन और जेल का रास्ता दिखाया जाना चाहिए।
जब तक व्यवस्था में 'भगोड़े बाबुओं' को संरक्षण मिलता रहेगा, तब तक सुशासन का दावा सिर्फ कागजों पर रेंगता रहेगा, और जनता न्याय के लिए भागती रहेगी।

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