भाजपा नेता द्वारा आदिवासियों को मिले पट्टे की जमीनों पर भारी लूट,
पट्टे की जमीनों का बिना आदेश नही हो सकता प्रारूप चेंज ऐसे जमीन सरकार द्वारा , लाचार
भाजपा नेता द्वारा आदिवासियों को मिले पट्टे की जमीनों पर भारी लूट,
पट्टे की जमीनों का बिना आदेश नही हो सकता प्रारूप चेंज ऐसे जमीन सरकार द्वारा , लाचार, बेबस विकलांग लोगो को दिया जाता है पट्टा,
रेणुकूट ( सोनभद्र ) खड़पाथर मुर्धवा अंतर्गत भाजपा नेता द्वारा पट्टे पर मिली आदिवासी की जमीन को कुटरचित षड्यंत्र के अंतर्गत पहले आदिवासी के जमीन को अपने पिछ लग्गू किसी आदिवासी को ट्रांसफर करवाता है फिर उसे धीरे धीरे धारा अस्सी कराता जाता है और बेचते जाता है , या फिर बदलवन कर बेच देता है ।
ऐसे ही एक मामला आया है खड़पाथर में बीजेपी नेता चांद प्रकाश जैन ( पूर्व अल्पसंख्यक पूर्व कार्य समिति सदस्य )
की जो लगभग कुल मिलाकर 09 आराजी नम्बर के 1.1845 हेक्टेयर जमीन को खैराही स्थित रनटोला और किरवानी की जमीन को खड़पाथर के उतने ही जमीन को ये दिखाकर एक आदिवासी से बदलावन करता ही की उक्त जमीन कृषि योग्य सुविधा के साथ है , उक्त दोनों जमीनों का दर ( मूल्य) एक समान है , जबकि खड़पाथर का सरकारी रेट 790/ है तो रनटोला का रेट 350/ का निर्धारित है । तो उसे बदलावां की मंजूरी कैसे दी जा सकती है , किंतु यहां बदलावन की मंजूरी दी जाती है । वैसी स्थिति में ये बदलावन ही अवैध मानी जा सकती है ।
जबकि यहां बदलावन हो गया और धीरे धीरे सारी जमीनें बिक कर एक आलीशान मोहल्ला के रूप में खड़ा हो गया ।
अब प्रश्न ये उठता है कि जब वो बंजर भूमि श्रेणी दो की जमीन आदिवासी को उसके जितकोपर्जन के लिए सरकार द्वारा पट्टे के रूप में दिया गया था तो फिर उस जमीन पर दूसरे आदिवासी का नाम कैसे चढ़ा ।
सर्वे के समय 1992 में एक आदिवासी सीताराम के नाम जमीन दर्ज कराने के लिए दावा किया गया मगर उस समय के रह रहे अधिकारियों ने जांच कर पाया की इस जमीन पर तो जिसको पट्टा मिला था उसी का कब्जा है तो उस समय के रहे एआरओ ने सीताराम का दावा खारिज कर दिया , पुनः सात से आठ महीने बाद 1993 में सब सेट कर पुनः दावा पेश किया गया और सेटिंग के आधार पर जमीन सीताराम के नाम खतौनी में दर्ज कर दिया गया । सोचिए पट्टे में मिला जमीन को कैसे सीताराम के नाम कर दिया गया जो नियम विरुद्ध था । जब एक बार उक्त जमीन पर लगा दावा खारिज कर दिया गया तो सात से आठ महीने में ऐसा क्या हुआ जो मान लिया गया , अब इसका ज़बाब तो उक्त अधिकारी ही उस समय के कोर्ट में देंगे ।
पुनः उसी छः बीघा जमीन को 2003 में सीताराम से चांद प्रकाश जैन द्वारा कृषि योग्य दिखाकर बदलावन कर मोटी रकम में बेच दिया गया और अब एक दो से तीन मंजिला भवनों का पूरा मोहल्ला बन गया ।
इस संदर्भ में गायत्री फाउंडेशन द्वारा हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका ( P. I .L ) दाखिल किया गया है, जिसमे समस्त तथ्यों के साथ सटीफाई कागजों को निकाल कर कोर्ट के समस्त रखा गया है । अब निर्णय कोर्ट को लेना है की उक्त जमीन का कैसे न्याय मिले ।
पूर्व के इस प्रकार के केसों को देखा जाय तो कोर्ट का एक ही निर्णय होता है कि जिस आदिवासी को उक्त जमीन पट्टे पर जीवोत्कोपर्जन के लिए दिया गया था यदि उसके परिवार में कोई है तो उसको खाली कराकर उसको दे दिया जाय या फिर राज्य सरकार के खाते में डाल दिया जाय ।