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भ्रष्टाचार पर प्रहार "बिहार में रिश्वतखोर डेटा एंट्री ऑपरेटर रंगे हाथ गिरफ्तार"





विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार



​पटना: बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को आगे बढ़ाते हुए निगरानी अन्वेषण ब्यूरो (Vigilance Investigation Bureau) ने एक बार फिर बड़ी कार्रवाई की है। पटना जिले के नौबतपुर स्थित बाल विकास परियोजना कार्यालय (CDPO) में तैनात एक डेटा एंट्री ऑपरेटर, संतोष कुमार को 37,100 की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया है।

यह कार्रवाई इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सरकारी व्यवस्था के निचले और मध्यम स्तर पर पसरा भ्रष्टाचार किस कदर आम जनता और योजनाओं को खोखला कर रहा है।



​क्या है पूरा मामला?

​निगरानी विभाग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति (संख्या 0-63/2026) के अनुसार, यह पूरी कार्रवाई एक सुव्यवस्थित जाल (Trap) बिछाकर की गई।



शिकायतकर्ता श्रीमती सुशीला कुमारी (पति- श्री सुमित प्रकाश, निवासी- गायघाट, आलमगंज, पटना), जो वर्तमान में नौबतपुर बाल विकास परियोजना कार्यालय में पर्यवेक्षिका (Supervisor) के पद पर कार्यरत हैं, उन्होंने निगरानी विभाग में आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई थी।



​शिकायत में आरोप लगाया गया था कि आरोपी डेटा एंट्री ऑपरेटर संतोष कुमार द्वारा उनके अंतर्गत आने वाले 17 आंगनबाड़ी केंद्रों के पोषाहार और अंडा राशि के भुगतान के एवज में रिश्वत की मांग की जा रही थी।



यह राशि प्रति केंद्र लगभग 10,000 से 14,000 के हिसाब से आवंटित थी।

आरोपी द्वारा सीडीपीओ मैडम के नाम पर और स्वयं के लिए 1% 'कमीशन' के तौर पर अवैध रूप से पैसों की मांग की जा रही थी।



​जांच और धावा दल (Trap Team) का गठन

​शिकायत मिलने के बाद निगरानी ब्यूरो की मुख्यालय टीम ने मामले का सत्यापन (Verification) कराया। सत्यापन के दौरान रिश्वत मांगे जाने के पुख्ता प्रमाण मिले।

आरोप सही पाए जाने के बाद, पुलिस उपाधीक्षक (DSP) श्री सुजीत कुमार सागर के नेतृत्व में एक विशेष धावा दल का गठन किया गया।



​20 मई 2026 को टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी संतोष कुमार को उसके कार्यालय कक्ष से ही 37,100 की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों दबोच लिया।

गिरफ्तारी के बाद आरोपी को पूछताछ के लिए पटना स्थित विशेष न्यायालय (निगरानी) में पेश करने की प्रक्रिया चल रही है।



​ व्यवस्था में दीमक की तरह फैला 'कमीशन राज'

​यह मामला केवल एक कर्मचारी की गिरफ्तारी का नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर गहरी चोट है जो सीधे तौर पर समाज के सबसे कमजोर वर्ग—महिलाओं और बच्चों के पोषण से जुड़ी है।



आंगनबाड़ी केंद्रों के पोषाहार (Nutrition) बजट में से 1% या निश्चित कमीशन की मांग करना बेहद शर्मनाक और अमानवीय है।



​इस कार्रवाई के कई महत्वपूर्ण पहलू हैं:

​शिकायतकर्ता का साहस: भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार आम नागरिक या कर्मचारियों का साहस है। पर्यवेक्षिका सुशीला कुमारी ने रिश्वत देने के बजाय कानून का रास्ता चुना, जो सराहनीय है।



​निगरानी विभाग की मुस्तैदी: ब्यूरो ने न केवल शिकायत पर तेजी से काम किया बल्कि पुख्ता सबूत जुटाकर आरोपी को रंगे हाथों पकड़ा, जिससे अदालत में केस कमजोर न हो।



​वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की जांच जरूरी:



"सी०डी०पी०ओ० मैडम के लिए" भी पैसे मांग रहा था। निगरानी ब्यूरो को इस बात की भी गहन जांच करनी चाहिए कि क्या इस रैकेट में कार्यालय के उच्च अधिकारी भी शामिल थे या आरोपी केवल उनके नाम का इस्तेमाल कर रहा था।



​निष्कर्ष

​भ्रष्टाचार के विरुद्ध निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, बिहार की यह कार्रवाई स्वागत योग्य है।

ऐसी कार्रवाइयां सरकारी बाबुओं और बिचौलियों के मन में कानून का डर पैदा करती हैं।

हालांकि, जब तक भ्रष्टाचार की जड़ों पर प्रहार नहीं होगा और पूरी प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी (Transparent) नहीं बनाया जाएगा, तब तक ऐसी घटनाओं को पूरी तरह रोकना मुश्किल होगा।

उम्मीद है कि इस मामले में त्वरित सुनवाई होगी ताकि समाज में एक कड़ा संदेश जाए।

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