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तैल चित्र पर फूल चढ़ाने से नहीं बचेगी विरासत , बिहार को फिर चाहिए एक बागी नेता"



लेखक: विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

पटना: बिहार की राजनीति धीरे-धीरे ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां नेताओं की पहचान जनता के संघर्ष से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया प्रबंधन और चुनावी समीकरणों से तय होने लगी है।

ऐसे समय में बागी कुमार वर्मा का निधन केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि राजनीति के उस संस्कार का क्षय है जिसमें नेता जनता के बीच खड़ा होकर व्यवस्था से लड़ता था।

आज उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ रहे हैं, श्रद्धांजलि सभाएं हो रही हैं, बड़े-बड़े भाषण दिए जा रहे हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बिहार की राजनीति वास्तव में उनके विचारों को बचाना चाहती है, या फिर यह सब केवल राजनीतिक औपचारिकता बनकर रह जाएगा?

राजनीति अब विचार नहीं, प्रबंधन बनती जा रही है,
बागी कुमार वर्मा उस पीढ़ी के नेता थे, जिनकी राजनीति जातीय समीकरणों से शुरू होकर सामाजिक न्याय पर समाप्त होती थी।
वे सत्ता में रहते हुए भी सत्ता के खिलाफ बोलने का साहस रखते थे। यही कारण था कि उनके नाम के साथ जुड़ा “बागी” शब्द एक राजनीतिक ब्रांड नहीं, बल्कि जनसंघर्ष की पहचान बन गया।

आज बिहार की राजनीति में वैचारिक साहस तेजी से गायब हो रहा है।
दल बदलना आसान हो गया है, लेकिन जनता के पक्ष में खड़ा होना कठिन।
नेताओं के भाषणों में गरीब का दर्द दिखाई देता है, लेकिन नीतियों में नहीं।
वंचित वर्गों की चर्चा मंचों पर होती है, मगर जमीन पर उनकी आवाज़ दबा दी जाती है।
ऐसे दौर में बागी कुमार वर्मा की राजनीति एक आईना बनकर सामने आती है।

श्रद्धांजलि सभा में उमड़ा जनसैलाब क्या संकेत देता है?

किसी नेता की असली लोकप्रियता चुनावी जीत से नहीं, बल्कि उसके निधन के बाद उमड़ने वाली संवेदनाओं से मापी जाती है।

जब उनके तैल चित्र पर लोग फूल चढ़ा रहे थे, तब वहां केवल राजनेता नहीं थे—वहां किसान थे, गरीब थे, पुराने कार्यकर्ता थे, वे लोग थे जिनके लिए बागी बाबू “नेता” नहीं बल्कि “सहारा” थे।

आज की राजनीति में ऐसे दृश्य दुर्लभ होते जा रहे हैं।
क्योंकि अब जनता और नेता के बीच संवाद खत्म हो रहा है।

राजनीति डिजिटल हो रही है, लेकिन मानवीय नहीं।

बिहार की राजनीति का संकट:
जमीनी नेताओं का खत्म होना,
बिहार में एक समय ऐसा था जब राजनीति आंदोलनों से पैदा होती थी।
छात्र आंदोलन, सामाजिक न्याय आंदोलन, किसान संघर्ष—इन्हीं से नेता निकलते थे।
लेकिन अब राजनीति कॉरपोरेट रणनीति और जातीय गणित के बीच सीमित होती जा रही है।
यही कारण है कि जनता को आज भी पुराने जमीनी नेताओं की याद आती है।

बागी कुमार वर्मा जैसे नेता इसलिए अलग थे क्योंकि वे जनता की भाषा बोलते थे, प्रशासनिक व्यवस्था को चुनौती देते थे और सत्ता को प्रश्नों के घेरे में रखते थे।

सबसे बड़ा प्रश्न:
क्या उनकी विरासत जीवित रहेगी?
आज उनके समर्थक और राजनीतिक साथी श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
लेकिन वास्तविक परीक्षा आने वाले वर्षों में होगी—

क्या सामाजिक न्याय की राजनीति केवल भाषणों तक सीमित रहेगी?
क्या गरीबों और पिछड़ों की आवाज फिर उतनी ही मजबूती से उठेगी?
क्या राजनीतिक दल ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाएंगे जो “हां में हां” न मिलाकर सच बोलने का साहस रखते हों?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर “नहीं” है, तो समझ लीजिए कि तैल चित्र पर चढ़े फूल कुछ दिनों में सूख जाएंगे और विचार भी धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में दब जाएंगे।

निष्कर्ष:
“बागी बाबू चले गए, लेकिन बिहार को अब भी एक बागी नेतृत्व की जरूरत है”
आज बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में सबसे बड़ी कमी ईमानदार वैचारिक नेतृत्व की है।

नेता बहुत हैं, लेकिन जननेता कम।
बागी कुमार वर्मा का जीवन इस बात का प्रमाण था कि राजनीति केवल सत्ता पाने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के दबे-कुचले लोगों की आवाज बनने का दायित्व भी है।
उनकी श्रद्धांजलि सभा में बिखरे गुलाब के फूल शायद यही कह रहे थे—
“नेता मरते नहीं, यदि उनके विचार जनता के भीतर जीवित रहें।”
बिहार ने एक बेबाक आवाज खो दी है।
अब देखना यह है कि क्या आने वाली पीढ़ी उस आवाज को आगे बढ़ा पाएगी, या फिर राजनीति केवल पोस्टर, प्रचार और प्रबंधन तक सिमटकर रह जाएगी।
उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

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