हरी खाद के लिए सनई या ढैंचा बोयें, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दें
टीकमगढ़। कृषि विज्ञान केंद्र टीकमगढ़ के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. बी.एस. किरार सहित वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की है कि वे जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए हरी खाद हेतु सनई या ढैंचा की बुवाई करें।
वैज्ञानिकों ने बताया कि हमारे पूर्वज भी भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ाने के लिए सनई और ढैंचा जैसी फसलों का उपयोग करते थे। दलहनी फसलों को वानस्पतिक अवस्था में मिट्टी में पलटकर दबाने की प्रक्रिया को हरी खाद कहा जाता है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति और उत्पादकता में वृद्धि होती है। हरी खाद के लिए ढैंचा, सनई, उर्द, मूंग, लोबिया, चना, मसूर, मटर, मोठ, खेसारी और कुल्थी प्रमुख फसलें हैं। जायद मौसम में विशेष रूप से सनई, ढैंचा, उर्द एवं मूंग का उपयोग अधिक किया जाता है। मई के अंतिम सप्ताह में इनकी बुवाई कर लगभग 40 दिन बाद खेत में जुताई कर मिट्टी में मिला देना चाहिए।
🔹 सनई के लिए 20 किलो बीज प्रति एकड़
🔹 ढैंचा के लिए 16 से 20 किलो बीज प्रति एकड़ पर्याप्त माना गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार हरी खाद से मिट्टी में नत्रजन एवं कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है, जल धारण क्षमता सुधरती है और सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति होती है। इससे मिट्टी की संरचना बेहतर होने के साथ उत्पादन क्षमता भी बढ़ती है। हरी खाद के प्रयोग से मृदा जनित रोगों में कमी आती है तथा खरपतवार नियंत्रण में भी सहायता मिलती है। किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाकर भूमि की सेहत सुधारने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की सलाह दी गई है।