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कविता : जब बुढ़ापा आ जाए


जब बुढ़ापा आ जाए,
तो आवाज़ धीमी हो जाती है,
मगर दिल के भीतर
यादों की हलचल तेज़ हो जाती है।

चेहरे की झुर्रियों में
समय की लंबी कहानी बसती है,
हर रेखा में बीते वर्षों की
एक अधूरी निशानी बसती है।

जब बुढ़ापा आ जाए,
तो कदम थोड़े थम जाते हैं,
मगर मन के आँगन में
बचपन के दिन फिर खिल जाते हैं।

पुराने दोस्त याद आते हैं,
वो गलियाँ, वो चौपालें,
वो बारिश में भीगना,
वो कागज़ की छोटी नावें।

जब बुढ़ापा आ जाए,
तो आँखें जल्दी नम हो जाती हैं,
क्योंकि छोटी-छोटी बातें भी
दिल को गहराई से छू जाती हैं।

बेटों की व्यस्त दुनिया में
माँ-बाप अक्सर चुप रहते हैं,
अपनी तकलीफ़ को मुस्कान में छिपाकर
हर दिन धीरे-धीरे सहते हैं।

जब बुढ़ापा आ जाए,
तो इंसान को दौलत नहीं,
बस थोड़ा अपनापन चाहिए,
दो मीठे शब्द चाहिए,
और किसी अपने का साथ चाहिए।

उसे नहीं चाहिए
महलों की ऊँची दीवारें,
बस कोई पूछ ले प्यार से —
“आज आपकी तबीयत कैसी है?”

जब बुढ़ापा आ जाए,
तो रातें लंबी लगती हैं,
नींद कम और चिंताएँ
बहुत ज़्यादा लगती हैं।

बीते हुए लोग
अक्सर सपनों में आते हैं,
और अधूरे रिश्ते
मन को चुपचाप रुलाते हैं।

कभी जो घर का आधार थे,
आज सहारे की तलाश में रहते हैं,
जो सबको चलना सिखाते थे,
वो अब किसी के हाथ पकड़कर चलते हैं।

जब बुढ़ापा आ जाए,
तो शरीर साथ कम देता है,
मगर अनुभव का सूरज
और अधिक उजाला देता है।

उनकी बातें भले पुरानी लगें,
मगर उनमें जीवन का सार होता है,
हर सफ़ेद बाल के पीछे
एक पूरा संसार होता है।

बुढ़ापा कोई अभिशाप नहीं,
ये जीवन की सबसे सच्ची किताब है,
जिसने इसे समझ लिया,
उसे हर रिश्ते की कीमत याद है।

जब बुढ़ापा आ जाए,
तो अपनों का सम्मान देना,
धीरे बोलना, पास बैठना,
और उनका मन कभी मत दुखाना।

क्योंकि एक दिन
समय सबको वहीं ले जाएगा,
आज जो जवान है,
कल वही बुढ़ापा पाएगा।

तब शायद समझ आएगा
कि बूढ़े हाथ क्यों काँपते थे,
और माँ-बाप चुप रहकर भी
इतना कुछ क्यों सहते थे।

जब बुढ़ापा आ जाए,
तो इंसान फिर बच्चा बन जाता है,
थोड़े प्यार, थोड़ी परवाह से
पूरा संसार पा जाता है।

इसलिए बुढ़ापे को बोझ नहीं,
ईश्वर का अनुभव मानो,
जो आज तुम्हारे साथ हैं,
उन्हें दिल से पहचानो।

क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी दौलत
न पैसा है, न शोहरत,
सबसे बड़ी दौलत है —
बुज़ुर्गों की दुआ और मोहब्बत।

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