उलिहातु में जनजातीय संस्कृति की झलक, बिरसा मुंडा के परिजन के कर्ण भेदन संस्कार में शामिल हुए अतिथि
Birsa Munda की जन्मस्थली Ulihatu में आयोजित एक पारंपरिक कर्ण भेदन संस्कार कार्यक्रम ने जनजातीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता की अनूठी मिसाल पेश की। भगवान बिरसा मुंडा जी के परपौत्र सुखराम मुंडा जी के पोते नारायण मुंडा के कर्ण भेदन संस्कार में बड़ी संख्या में समाज के लोग शामिल हुए और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।
इस अवसर पर अतिथियों का जनजातीय परंपराओं के अनुरूप आत्मीय स्वागत किया गया। पारंपरिक वेशभूषा, लोक संस्कृति और आदिवासी रीति-रिवाजों ने कार्यक्रम को विशेष बना दिया। उपस्थित लोगों ने कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का कार्य करते हैं।
कार्यक्रम में पारंपरिक जनजातीय भोजन भी आकर्षण का केंद्र रहा, जिसका स्वाद और आतिथ्य सभी के लिए अविस्मरणीय अनुभव बन गया। लोगों ने एक स्वर में कहा कि झारखंड की जनजातीय संस्कृति केवल राज्य ही नहीं बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक पहचान और शक्ति है।
इस मौके पर वक्ताओं ने कहा कि आधुनिकता के दौर में अपनी परंपराओं को जीवित रखना बेहद आवश्यक है। भगवान बिरसा मुंडा का संघर्ष केवल जल, जंगल और जमीन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने आदिवासी समाज की संस्कृति, स्वाभिमान और पहचान को बचाने का भी कार्य किया था। आज उनके परिवार में आयोजित यह संस्कार उसी विरासत को आगे बढ़ाने का प्रतीक माना जा रहा है।
अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताएं — क्या हमारी जनजातीय परंपराओं को नई पीढ़ी तक मजबूती से पहुंचाने के लिए ऐसे आयोजनों को और बढ़ावा मिलना चाहिए?