शाहपुर पटोरी के खेतों पर नीलगायों का ग्रहण:सरकारी बाबू मस्त अन्नदाता पस्त।
"वो जिसके खून-पसीने से लहलहाती है जमीं अक्सर,उसी दहकान (किसान) के हिस्से में सूखी रोटी आती है अक्सर।"
शाहपुर पटोरी (समस्तीपुर):- बिहार की आत्मा कृषि में बसती है और यहां की बहुसंख्यक आबादी अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह खेती पर निर्भर है। सरकारें मंचों से बड़े-बड़े दावे करती हैं कि वे किसानों की आय दोगुनी करने और कृषि रोडमैप के जरिए समृद्धि लाने के लिए "संकल्पित" हैं। लेकिन अगर इन दावों का सच देखना हो, तो शाहपुर पटोरी अनुमंडल के नजदीकी गांवों जैसे शिवरा चकसाहो और बहादुरपुर पटोरी के खेतों में आकर देखिए। यहां जमीनी हकीकत इन हवाई दावों से कोसों दूर, बेहद कड़वी और दर्दनाक है।
आस्था और सरकारी उदासीनता के बीच पिसता अन्नदाता :
इन दिनों पटोरी अनुमंडल के इन गांवों के किसान एक अजीब और लाइलाज सी बन चुकी समस्या से जूझ रहे हैंवह है नीलगाय (स्थानीय भाषा में घोरपरास) का आतंक। कभी खेतों में हरी-भरी सब्जियां और फसलें देखकर जिन किसानों की आंखें चमक उठती थीं, आज वे डर के साए में जीने को मजबूर हैं। नीलगायों का झुंड आता है और चंद मिनटों में मेहनत से सींची गई सब्जियों की फसलों को बुरी तरह रौंदकर बर्बाद कर देता है।
विडंबना देखिए कि इस समस्या का समाधान सिर्फ इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि एक आम धार्मिक अवधारणा (नाम में 'गाय' शब्द जुड़े होने के कारण) आड़े आ जाती है, जिससे इन्हें मारने या हटाने का कड़ा कदम नहीं उठाया जाता। हालांकि, बिहार विधानसभा में भी समय-समय पर इस मुद्दे को लेकर आवाज उठती रही है, लेकिन अफसोस! सालों बीत जाने के बाद भी पटोरी के किसानों की तकदीर नहीं बदली।
किसान का दर्द यह है कि सरकार की नीतियां फाइलों में तो बहुत सुनहरी दिखती हैं, लेकिन धरातल पर उनकी छोटी-छोटी समस्याओं को सुनने वाला कोई नहीं है। वन विभाग के कर्मचारी और सरकारी बाबू पूरी तरह से निष्क्रिय और संवेदनहीन बने हुए हैं।
वेतन की गारंटी बनाम दो जून की रोटी:-सरकारी बाबुओं को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि नीलगाय ने किस किसान का खेत उजाड़ दिया। उन्हें पता है कि महीने की एक तारीख को उनका वेतन उनके खाते में आ जाएगा। वे सिर्फ अपनी ड्यूटी का औपचारिकता पूरा कर रहे हैं।
लागत डूबने का दर्द:-दूसरी तरफ वह अभागा किसान है, जो पाई-पाई जोड़कर, पेट काटकर अपने खेत में पूंजी लगाता है ताकि परिवार का भरण-पोषण हो सके। जब फसल बर्बाद होती है, तो वह कर्ज के दलदल में धंस जाता है।
ऐसा नहीं है कि इस समस्या का कोई वैज्ञानिक या प्रशासनिक समाधान नहीं है। सरकार चाहे तो कंटीले तारों के लिए विशेष सब्सिडी, नीलगायों को पकड़कर सुदूर जंगलों या अभ्यारण्यों में स्थानांतरित करने की व्यवस्था, या फसलों के भारी नुकसान पर त्वरित मुआवजे का प्रावधान कर सकती है। लेकिन समस्या यह है कि समाधान करने वाले खुद 'कुंभकर्णी नींद' सोए हुए हैं। उन्हें अपनी आजीविका की कोई चिंता नहीं है, क्योंकि उनके जीवन का ठेका तो सरकार ने ले रखा है।
शाहपुर पटोरी के शिवरा, चकसाहो और बहादुरपुर पटोरी के किसानों का यह सब्र अब टूटने की कगार पर है। स्थानीय रूपौली के किसान विजय सिंह बताते हैं कि उन्होंने अपने खेत में ओल का फसल लगाया हुआ था जो लगभग 2 फीट का हो गया था लेकिन एक ही रात में नीलगाय ने उनकी सारी फसल नष्ट कर दिया ।
कृषि विभाग और वन विभाग का यह उदासीन रवैया अन्नदाता के साथ सीधे तौर पर क्रूरता है। अगर सरकार वास्तव में किसानों के प्रति गंभीर है, तो उसे आडंबर छोड़ना होगा और धरातल पर आकर इन नीलगायों के आतंक से किसानों को मुक्ति दिलानी होगी। वरना, वो दिन दूर नहीं जब खेतों में फसलों की जगह सिर्फ बेबसी की धूल उड़ेगी।
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
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