मलमास: अतिरिक्त महीना या आध्यात्मिक ऊर्जा का महापर्व?
पटना/धार्मिक डेस्क: हिंदू पंचांग में समय-समय पर आने वाला मलमास, जिसे अधिक मास और पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, इन दिनों श्रद्धालुओं और धर्माचार्यों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। आम लोगों के मन में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि आखिर मलमास क्या है, इसका महत्व क्यों है और इसे पुरुषोत्तम मास क्यों कहा जाता है?
धर्म विशेषज्ञों के अनुसार, हिंदू पंचांग चंद्रमा की गति पर आधारित होता है। एक चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है, जबकि सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का। दोनों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर हर वर्ष बनता है। इसी अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग 32 महीने 16 दिन बाद एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास या मलमास कहा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रारंभिक समय में इस अतिरिक्त महीने का कोई विशेष स्थान नहीं था। चूंकि इस महीने में सूर्य की संक्रांति नहीं होती, इसलिए इसे शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना गया। विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्य इस दौरान टाल दिए जाते थे। इसी कारण यह महीना उपेक्षित होकर मलमास कहलाया।
लेकिन पौराणिक कथा इस महीने को एक नया और विशेष सम्मान देती है। मान्यता है कि उपेक्षित होकर यह महीना भगवान विष्णु के पास पहुंचा और अपनी पीड़ा व्यक्त की। तब भगवान विष्णु ने इसे अपना सर्वोच्च नाम पुरुषोत्तम प्रदान किया। इसके बाद यह महीना पुरुषोत्तम मास के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
धर्माचार्यों का कहना है कि पुरुषोत्तम मास सांसारिक कार्यों की बजाय आध्यात्मिक साधना के लिए समर्पित माना जाता है। इस दौरान भगवान विष्णु की पूजा, गीता पाठ, दान-पुण्य, रामायण श्रवण और जप-तप का विशेष महत्व बताया गया है।
विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि मलमास को अशुभ मानना सही नहीं है। यह महीना केवल मांगलिक कार्यों के लिए सीमित माना गया है, जबकि धार्मिक दृष्टि से इसे अत्यंत पुण्यदायी और ईश्वर भक्ति का श्रेष्ठ समय माना जाता है।
धर्म जगत में एक संदेश आज भी प्रचलित है जिसे संसार ने उपेक्षित समझा, भगवान ने उसी को पुरुषोत्तम बनाकर श्रेष्ठ स्थान दिया। यही पुरुषोत्तम मास का सबसे बड़ा संदेश माना जाता है।