धर्म का यथार्थ स्वरूप यतो धर्म: ततो जय।
प्रस्तोता - घेवरचंद आर्य
धर्म का स्वरूप यतो_धर्मः_ततो_जयः
प्रस्तोता- घेवरचंद आर्य
जहाँ धर्म है वहाँ विजय है।
महाभारत में अनेक स्थानों पर, यह बात कही गई है। इस पर विचार करने पर सर्वप्रथम धर्म का शाब्दिक अर्थ जानना पड़ेगा।
प्रश्न उठता है कि क्या हिंदू, जैन, बौद्ध, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि धर्म नहीं है ? इसका उत्तर यह है कि ये धर्म नहीं मजहब है।
धृ मे मन् प्रत्यय लगा कर धर्म शब्द बना है , जिसमें धृधातु का अर्थ धारण और पोषण करना है।
शाब्दिक दृष्टि से मतलब हुआ कि धर्म वह है, जो मनुष्य को मनुष्यता धारण कराए और आजीवन उस मनुष्यता को ही परिपुष्ट करे। इस प्रकार फलित हुआ कि, धर्म मानव जीवन का वह तत्व है, जिससे वह मनुष्य बनता है।
तब प्रश्न उठा कि वह क्या है ?जिससे मनुष्य की मनुष्यता सुरक्षित रहती है, तो उत्तर आया , आचरण ही मनुष्य की मनुष्यता सुरक्षित रखती है इसलिए शास्त्रों में कहां गया है।आचार:परमो धर्म:
मनुष्य जीवन का आदर्श ही है मानवीय विचार और आचार । गीता में भी स्पष्ट कहां है -
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: और भी स्पष्ट किया कि यदि हम मानवीय आचार आदि त्याग कर अमानवीय व्यवहार ग्रहण करें तो वह अधर्म होगा और हम राक्षस/पशु कहे जाने योग्य होंगे। इसीलिये अपने मानव जीवन मूल्य- त्याग, करूणा, दया, क्षमा, धैर्य, सन्तोष आदि का पालन करते हुए उसके लिये मर मिटना, ही श्रेयस्कर है। यही धर्म का सार है । नहीं तो संग्रह और असन्तोष आदि तो भयंकर दु:ख के ही कारण बनते हैं।
उपर लिखे मजहबों में अगर भी कोई व्यक्ति आचारशील है और धर्म के दस लक्षणों पर खरा उतरता है तो वह धर्म का ही साक्षात स्वरूप है अन्यथा वह अधर्म का रूप है।
अतः धर्म मानवीय कर्तव्य कर्म पूर्वक सत्य आचरण मार्ग पर ही चलने में विजय प्राप्ति सुनिश्चित है। और अन्तिम बात तो ये है कि धर्म न केवल इस जन्म में वास्तविक विजयकारक है, अपितु अन्य जन्म में भी मानव का एकमात्र साथी है- देहश्चितायां परलोक मार्गे धर्मानुगो गच्छति जीव एक:।