बिना गोली चलाए इंकलाब
अनुभा नाथ
निमवाला मारगो, रूप-रंग के लिए अमृत
या फिर प्रिटी अग्ली, प्रिटी गुड।
बात हो रही है उस अद्वितीय साबुन मारगो की, जो वर्षों तक भारतीय समाज और भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा बना रहा। दूरदर्शन के विज्ञापनों से लेकर अखबारों के पन्नों तक, इस साबुन ने गर्व के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इसका इतिहास भी उतना ही गौरवपूर्ण और अनोखा है।
मेरी नब्बे वर्षीया बुआ अपनी सांझ की तरह मुरझाई, झुर्रियों भरी त्वचा दिखाते हुए गर्व मिश्रित स्वर में बोलीं
तुम लोग आधुनिक हो, इस साबुन का मर्म क्या समझोगे! मेरी त्वचा की सारी चमक इसी मारगो की देन है!
सचमुच, बंगाल के उत्थान और उसकी आत्मगौरव की भावना के साथ मारगो साबुन गहराई से जुड़ा हुआ है।
नीम को अंग्रेज़ी में Neem Tree कहा जाता है और इसे Margosa नाम से भी जाना जाता है। इसी Margosa शब्द से मारगो नाम की उत्पत्ति हुई।
मारगो साबुन का इतिहास
ब्रिटिश शासनकाल में 1857 के सिपाही विद्रोह का कारण हम सभी जानते हैं। एनफील्ड राइफल की कारतूसों में पशु-चर्बी के उपयोग के विरोध में भारतीय सैनिकों ने विद्रोह किया था। यही विद्रोह आगे चलकर भारत में राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बना।
इसके बाद 1905 में लॉर्ड कर्ज़न के बंग-भंग के खिलाफ पूरा बंगाल खड़ा हो गया। उसी समय विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का आंदोलन शुरू हुआ।
इसी स्वदेशी भावना से प्रेरित होकर 1916 में एक प्रतिभाशाली बंगाली युवक ने पूर्णतः देशी संसाधनों और रसायनों से भारत का अपना साबुन बनाया। उनका नाम था खगेनचंद्र दास।
उनके पिता प्रसिद्ध बैरिस्टर और न्यायाधीश थे, जबकि उनकी माता एक समर्पित गांधीवादी और नारी आत्मरक्षा समिति की अध्यक्षा थीं।
कोलकाता में शिक्षा पूर्ण करने के बाद खगेनचंद्र दास ने शिवपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्यापन कार्य शुरू किया। माँ से प्रेरणा लेकर वे ब्रिटिश-विरोधी गतिविधियों में शामिल हुए और शीघ्र ही अंग्रेज़ सरकार की निगाहों में आ गए।
जब उनके पिता ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजना चाहा, तब उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे अंग्रेज़ों के देश में पढ़ाई नहीं करेंगे। हालांकि शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा उन्होंने छोड़ी नहीं। Indian Society for the Advancement of Scientific Industry से छात्रवृत्ति प्राप्त कर वे अमेरिकी जहाज़ से कैलिफोर्निया रवाना हुए।
1910 में उन्होंने स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से रसायन विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की और वे वहाँ से स्नातक होने वाले पहले भारतीय बने।
आने वाले वर्षों में यही प्रतिभाशाली बंगाली युवक मारगो साबुन का निर्माता बना।
स्वदेशी साबुन की क्रांति
उस समय ब्रिटिश भारत के बाजारों में जो साबुन बिकते थे, उनमें पशुओं की चर्बी का उपयोग होता था। गाय, भैंस और सूअर की चर्बी से बने इन साबुनों को लार्ड साबुन कहा जाता था।
खगेनचंद्र दास ने कोलकाता के 35 नंबर पंडितिया रोड स्थित प्रसिद्ध कैलकटा केमिकल कंपनी में बिना चर्बी वाला साबुन मारगो तैयार किया।
यह साबुन ब्रिटिश कंपनियों के एकाधिकार वाले बाजार में हलचल मचा गया। लोग सिर पर टोकरियाँ रखकर गलियों और सड़कों पर मारगो साबुन बेचने लगे।
स्वदेशी साबुन की बिक्री ने देश की अर्थव्यवस्था और जनता के आत्मविश्वास को मजबूत किया।
बिना एक भी गोली चलाए, बिना कोई नारा लगाए, खगेनचंद्र दास ने अंग्रेज़ों के कानों में धीरे से इंकलाब की घोषणा कर दी।
मारगो की विशेषताएँ
आज मारगो साबुन केवल बंगाल ही नहीं, पूरे भारत में प्रसिद्ध है। यह मुख्यतः त्वचा रोगों से बचाव और त्वचा की देखभाल के लिए उपयोग किया जाता है।
इसका मुख्य घटक शुद्ध नीम का तेल और उसका अर्क है। इसके अलावा इसमें सोडियम पामेट, सोडियम पाम कर्नेलेट, ग्लिसरीन और विटामिन-ई होते हैं, जो त्वचा को कोमल और नम बनाए रखते हैं।
इसके अतिरिक्त टैल्क, सुगंध, सोडियम क्लोराइड, लॉरिक एसिड, डिसोडियम ईडीटीए, प्रिज़र्वेटिव और जल भी इसमें शामिल होते हैं।
साबुन का गहरा हरा रंग और इसकी सादगीपूर्ण हर्बल खुशबू इसे स्वतंत्रता-पूर्व काल से ही विशिष्ट बनाती आई है।
खगेनचंद्र दास का व्यक्तित्व
कहा जाता है कि एक समय मारगो की ब्रांड वैल्यू लगभग 75 करोड़ रुपये तक पहुँच गई थी। देश को मिला एक स्वदेशी साबुन और खगेनचंद्र दास को मिला जीवन का उद्देश्य तथा आत्मसंतोष।
अत्यंत स्वाभिमानी खगेनचंद्र दास अमेरिका से लौटने के बाद केवल खादी पहनते थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी वे कट्टर ब्रिटिश-विरोधी बने रहे।
वे कोलकाता में पढ़ने आने वाले युवाओं को छात्रवृत्ति देते थे और उन्हें नौकरी करने के बजाय स्वयं का व्यवसाय शुरू करने की प्रेरणा देते थे।
1953 में 70 वर्ष की आयु में इस महान बंगाली उद्योगपति का निधन हो गया।
बाद में कैलकटा केमिकल कंपनी ने मारगो साबुन के निर्माण का अधिकार हेन्केल इंडिया को सौंप दिया। फिर 2021 में ज्योति लैबोरेट्रीज़ लिमिटेड ने इसका स्वामित्व खरीद लिया।
110 वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी मारगो साबुन अपनी वही सुगंध, वही पहचान और वही गौरवशाली इतिहास लेकर बंगाल, भारत और भारतीयों के मन में अमिट और कालजयी बना हुआ है।
(मत लेखक के निजी हैं।)
लेखक एक निबंधकार हैं
monkahon.2021@gmail.com