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उत्तराखंड चुनाव से पहले भाजपा में बेचैनी, विधायकों को आखिरी मौका देने की चर्चा से बढ़े सवाल

देहरादून। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले सत्तारूढ़ भाजपा ने अपने विधायकों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। पार्टी हाईकमान द्वारा विधायकों को 31 अक्टूबर तक अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय रहने, लंबित विकास कार्यों को पूरा कराने और जनता के बीच लगातार मौजूद रहने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस कदम को सरकार और जनप्रतिनिधियों के प्रदर्शन पर उठ रहे सवालों से जोड़कर देखा जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार पार्टी नेतृत्व ने स्पष्ट संकेत दिया है कि आने वाले महीनों में विधायकों के कामकाज की गहन समीक्षा होगी। नवंबर और दिसंबर में प्रस्तावित दो नए सर्वे टिकट वितरण का आधार बन सकते हैं। माना जा रहा है कि कई क्षेत्रों में जनता के बीच नाराजगी और एंटी-इंकम्बेंसी की रिपोर्ट मिलने के बाद भाजपा संगठन अब डैमेज कंट्रोल मोड में आ गया है।

विकास के दावों पर सवाल क्यों?
भाजपा नेतृत्व ने विधायकों को विकास कार्यों में तेजी लाने और सरकार की योजनाओं को जमीन पर उतारने के निर्देश दिए हैं। लेकिन विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि यदि विकास कार्य समय पर और प्रभावी ढंग से हुए होते, तो चुनाव से ठीक पहले विधायकों को सक्रिय होने का अल्टीमेटम देने की जरूरत क्यों पड़ती?

राज्य में बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, सड़क और पेयजल जैसी मूलभूत समस्याओं को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। कई पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। ऐसे में चुनाव से पहले अचानक विकास कार्यों में तेजी लाने के निर्देश सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं।

तीन सर्वे में सामने आई नाराजगी:
सूत्रों के मुताबिक अब तक कराए गए तीन अलग-अलग सर्वे में कई सीटों पर भाजपा की स्थिति मजबूत बताई गई है, लेकिन करीब एक दर्जन से अधिक विधायकों के खिलाफ जनता में नाराजगी के संकेत मिले हैं। यही वजह है कि पार्टी संगठन अब हर विधायक के प्रदर्शन पर नजर बनाए हुए है।

विशेष रूप से उन सीटों पर फोकस बढ़ाया गया है जहां 2022 के चुनाव में भाजपा बेहद कम अंतर से जीत पाई थी। श्रीनगर, टिहरी, गदरपुर और नरेंद्रनगर जैसी सीटों पर जीत का अंतर काफी कम रहा था। वहीं चकराता, भगवानपुर, पिरान कलियर और धारचूला जैसी सीटों पर भाजपा अब तक मजबूत पकड़ नहीं बना सकी है।

चुनावी तैयारी या सरकार की विफलताओं की स्वीकारोक्ति?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा का यह सख्त रुख कहीं न कहीं इस बात का संकेत भी है कि सरकार जनता के बीच बढ़ती नाराजगी को लेकर चिंतित है। यदि जनता सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों से पूरी तरह संतुष्ट होती, तो विधायकों के प्रदर्शन का बार-बार मूल्यांकन और जनता के बीच जाने की हिदायतें शायद आवश्यक नहीं होतीं।

उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों के दौरान भर्ती परीक्षाओं में धांधली, बढ़ती महंगाई, रोजगार संकट और पलायन जैसे मुद्दों ने सरकार को लगातार घेरा है। अब चुनाव नजदीक आते ही भाजपा संगठन और सरकार दोनों जनता का भरोसा दोबारा जीतने की कोशिश में जुटे दिखाई दे रहे हैं।

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