रुपये की ऐतिहासिक गिरावट ने बढ़ाई चिंता, सरकार के दावों पर उठे सवाल
भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर लगातार मजबूत भारत और विश्वगुरु अर्थव्यवस्था के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ भारतीय रुपया रिकॉर्ड कमजोरी की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। सोमवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96 के पार पहुंच गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। आर्थिक विशेषज्ञ इसे केवल वैश्विक संकट नहीं, बल्कि घरेलू आर्थिक नीतियों और बढ़ती आयात निर्भरता का भी परिणाम मान रहे हैं।
सरकार लगातार भारत को दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बताती रही है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि यदि अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है तो रुपया लगातार क्यों टूट रहा है? बीते कुछ वर्षों में डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत लगातार गिरती गई है। इससे आम जनता पर महंगाई का दबाव बढ़ता जा रहा है।
तेल पर निर्भरता और कमजोर तैयारी:
भारत आज भी अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ते ही भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ता है। आलोचकों का कहना है कि सरकार ने वर्षों से आत्मनिर्भरता और वैकल्पिक ऊर्जा के बड़े दावे तो किए, लेकिन जमीन पर तेल आयात निर्भरता कम नहीं हो सकी।
रुपये की कमजोरी का सीधा असर पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, खाद्य पदार्थों और परिवहन लागत पर पड़ता है। यानी अंततः बोझ आम नागरिक को ही उठाना पड़ता है।
विदेशी निवेश पर अत्यधिक निर्भरता:
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय बाजार विदेशी निवेश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो चुका है। जैसे ही वैश्विक तनाव बढ़ता है, विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालना शुरू कर देते हैं और डॉलर की मांग अचानक बढ़ जाती है। इससे रुपया और कमजोर हो जाता है।
सरकार और रिजर्व बैंक की ओर से समय-समय पर हस्तक्षेप किए जाने के बावजूद रुपये की गिरावट नहीं रुक पा रही। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या आर्थिक मोर्चे पर दीर्घकालिक रणनीति की कमी है?
आयात शुल्क बढ़ाने से क्या महंगाई और बढ़ेगी?
सरकार ने हाल ही में सोना-चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाया और चांदी आयात नियमों को सख्त किया है। सरकार का तर्क है कि इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव कम होगा, लेकिन व्यापारियों और अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इसका सीधा असर घरेलू कीमतों पर पड़ेगा।
सोना-चांदी पहले ही रिकॉर्ड स्तर पर हैं। आयात शुल्क बढ़ने से ज्वेलरी उद्योग और आम ग्राहकों पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि सरकार विदेशी मुद्रा संकट को नियंत्रित करने में विफल रही है और अब उसका भार जनता पर डाला जा रहा है।
विश्वगुरु बनाम जमीनी आर्थिक हकीकत:
आलोचकों का कहना है कि एक तरफ सरकार भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति बताती है, वहीं दूसरी तरफ रुपया लगातार कमजोर हो रहा है, बेरोजगारी और महंगाई बनी हुई है और आम आदमी की क्रय शक्ति घट रही है।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि तेल कीमतें और वैश्विक तनाव इसी तरह बढ़ते रहे तो आने वाले समय में डॉलर के मुकाबले रुपया और कमजोर हो सकता है। इसका असर केवल शेयर बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हर परिवार के घरेलू बजट पर दिखाई देगा।