भारत की अर्थव्यवस्था : गिरता रुपया, बढ़ती महँगाई और आत्मनिर्भरता की चुनौती
भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। सरकार लगातार देश को विश्व की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बताती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। एक ओर GDP वृद्धि के दावे हैं, तो दूसरी ओर गिरता रुपया, बढ़ती महँगाई, बेरोजगारी, विदेशी निर्भरता और कमजोर होता विनिर्माण क्षेत्र देश की आर्थिक स्थिति पर चिंता पैदा कर रहे हैं।
जहाँ वर्ष 2024 में एक डॉलर की कीमत लगभग 83.30 रुपये थी, वहीं 2025 में यह बढ़कर 85.56 और फिर 89.88 तक पहुँच गई। अब 2026 के मध्य तक रुपया गिरकर लगभग 96 रुपये प्रति डॉलर के करीब पहुँच चुका है। किसी भी देश की मुद्रा में लगातार गिरावट यह संकेत देती है कि उसकी अर्थव्यवस्था पर बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार के दबाव बढ़ रहे हैं।
रुपये की गिरती कीमत का सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ता है। भारत अपनी जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, विशेषकर कच्चे तेल के लिए। देश अपनी आवश्यकता का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। तेल का भुगतान डॉलर में होता है। जब डॉलर महँगा होता है, तब भारत को अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इसका परिणाम पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में सामने आता है।
ईरान-अमेरिका-इजरायल संघर्ष और वैश्विक अस्थिरता ने क्रूड ऑयल की कीमतों को और बढ़ा दिया है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने से परिवहन लागत बढ़ती है और उसका असर फल, सब्जी, अनाज तथा रोजमर्रा की वस्तुओं पर पड़ता है। यही कारण है कि आज महँगाई आम आदमी की कमर तोड़ती दिखाई दे रही है।
भारत की आर्थिक समस्या केवल आयातित महँगाई तक सीमित नहीं है। पिछले एक दशक में देश की औद्योगिक और विनिर्माण नीतियों में अपेक्षित मजबूती नहीं दिखाई दी। छोटे और मझोले उद्योग यानी MSME क्षेत्र, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं, लगातार संकट में रहे। लाखों छोटे उद्योग बंद होने से रोजगार के अवसर कम हुए और बेरोजगारी बढ़ती चली गई।
सरकारी आँकड़ों के अनुसार बेरोजगारी दर नियंत्रित दिखाई जाती है, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक गंभीर प्रतीत होती है। बड़ी संख्या में शिक्षित युवा आज अस्थायी और कम वेतन वाले कार्यों में लगे हैं। डिग्रीधारी युवक-युवतियाँ फूड डिलीवरी और गिग इकॉनमी आधारित नौकरियों में काम करने को मजबूर हैं। यह केवल रोजगार का प्रश्न नहीं, बल्कि रोजगार की गुणवत्ता का भी संकट है।
एक समय भारत के IT और स्टार्टअप सेक्टर को भविष्य की ताकत माना जाता था, लेकिन अब वहाँ भी भर्ती की जगह छँटनी का दौर दिखाई दे रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव ने तकनीकी और कोडिंग आधारित कई नौकरियों पर खतरा पैदा कर दिया है।
भारत की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती उसकी बढ़ती आयात निर्भरता है, विशेषकर चीन पर। आज स्थिति यह है कि मोबाइल उद्योग से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलीकॉम मशीनरी, सोलर पैनल, फार्मास्यूटिकल्स के कच्चे पदार्थ, ऑटो पार्ट्स और रेयर अर्थ मटेरियल तक बड़ी मात्रा में चीन से आयात किए जाते हैं।
मोबाइल निर्माण के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के दावे किए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश पुर्जे चीन से आते हैं और भारत में केवल असेंबलिंग का काम होता है। यही कारण है कि चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है।
2025-26 में चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है। दोनों देशों के बीच व्यापार लगभग 151 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है, जिसमें भारत का आयात अत्यधिक अधिक है। यह असंतुलन भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये दोनों पर दबाव बनाता है।
चीन ने 1978 के आर्थिक सुधारों के बाद विनिर्माण क्षेत्र में अभूतपूर्व निवेश किया। उसने बंदरगाह, हाईवे, औद्योगिक क्लस्टर और निर्यात केंद्र विकसित किए तथा खुद को Factory of the World बना लिया। इसके विपरीत भारत कमजोर आधारभूत संरचना, महँगी बिजली, जटिल श्रम कानून, अधिक लॉजिस्टिक लागत और धीमी नीतिगत क्रियान्वयन जैसी समस्याओं से जूझता रहा।
आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चीन से व्यापार कम करना नहीं है, बल्कि अपनी घरेलू विनिर्माण क्षमता को इतना मजबूत बनाना है कि देश विदेशी निर्भरता से बाहर निकल सके। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक आर्थिक ताकत उसके उत्पादन, निर्यात और आत्मनिर्भरता में होती है।
यदि भारत को मजबूत अर्थव्यवस्था बनना है तो MSME क्षेत्र को पुनर्जीवित करना होगा, घरेलू उद्योगों को सस्ती बिजली और आसान ऋण देना होगा, कृषि और विनिर्माण दोनों को साथ लेकर चलना होगा तथा आयात आधारित उपभोक्ता मॉडल से बाहर निकलना होगा।
आर्थिक स्वतंत्रता केवल GDP के आँकड़ों से नहीं आती, बल्कि तब आती है जब देश अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर न रहे। आज भारत जिस आर्थिक मोड़ पर खड़ा है, वहाँ उसे केवल विकास के दावों नहीं, बल्कि मजबूत उत्पादन, रोजगार सृजन और आत्मनिर्भर औद्योगिक नीति की आवश्यकता है। वरना गिरता रुपया, बढ़ती महँगाई और बेरोजगारी आने वाले समय में और बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
नरेंद्र
सीनियर जर्नलिस्ट्स एवं ट्रू गाँधीयन