आरटीआई के दायरे से बाहर बीसीसीआई, केंद्रीय सूचना आयोग के फैसले से उठे बड़े सवाल
आरटीआई के दायरे से बाहर बीसीसीआई, केंद्रीय सूचना आयोग के फैसले से उठे बड़े सवाल
नई दिल्ली। देश में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक बार फिर नई बहस छिड़ गई है। केंद्रीय सूचना आयोग के एक महत्वपूर्ण फैसले में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को सूचना का अधिकार कानून यानी आरटीआई एक्ट के दायरे से बाहर माना गया है। आयोग ने अपने आदेश में कहा है कि बीसीसीआई न तो सरकारी संस्था है और न ही उसे सरकार द्वारा प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता प्राप्त होती है, इसलिए उसे लोक प्राधिकरण की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
इस फैसले के बाद देशभर में राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब बीसीसीआई भारतीय क्रिकेट टीम का संचालन करता है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करता है और करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है, तो फिर उसे जनता के प्रति जवाबदेह क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए।
गौरतलब है कि वर्ष 2018 में केंद्रीय सूचना आयोग ने बीसीसीआई को आरटीआई कानून के दायरे में माना था और बोर्ड को सूचना अधिकारी नियुक्त करने तक के निर्देश दिए गए थे। उस समय आयोग का मानना था कि बीसीसीआई सार्वजनिक कार्य करता है और उसके निर्णयों का प्रभाव देश के करोड़ों नागरिकों पर पड़ता है, इसलिए पारदर्शिता आवश्यक है।
हालांकि अब आयोग ने अपने ताजा फैसले में कहा है कि बीसीसीआई एक स्वायत्त संस्था है और उस पर सरकारी नियंत्रण लागू करना उसकी स्वतंत्र आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
इस निर्णय के बाद देश में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या सूचना का अधिकार कानून धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है? कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और आरटीआई कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि प्रभावशाली संस्थाओं को आरटीआई के दायरे से बाहर रखा जाएगा तो पारदर्शिता और जवाबदेही की मूल भावना प्रभावित होगी।
समाजिक व आरटीआई कार्यकर्ता तथा विश्व भारती जनसेवा संस्थान एनजीओ के संयुक्त सचिव नौशाद अली ने इस फैसले पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सूचना का अधिकार लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। यदि बड़ी संस्थाओं को आरटीआई से बाहर रखा जाएगा तो आम जनता के अधिकार कमजोर होंगे। उन्होंने कहा कि देश में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखने के लिए आरटीआई कानून को और मजबूत करने की आवश्यकता है, न कि उसे सीमित करने की।
वहीं कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरी तरह संवैधानिक और तकनीकी आधार पर लिया गया फैसला है, क्योंकि किसी संस्था को आरटीआई के दायरे में लाने के लिए उसका सरकारी नियंत्रण या सरकारी वित्तीय सहायता से जुड़ा होना आवश्यक माना जाता है।
फिलहाल इस फैसले ने देशभर में नई बहस को जन्म दे दिया है। लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या भविष्य में अन्य बड़ी संस्थाएं भी आरटीआई कानून से बाहर हो सकती हैं। साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सरकार और न्यायिक संस्थाएं धीरे-धीरे सूचना के अधिकार को सीमित करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
समाचार लेखन : नौशाद अली
समाजिक व आरटीआई कार्यकर्ता
संयुक्त सचिव, विश्व भारती जनसेवा संस्थान एनजीओ