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मातृभाषा व्यक्ति की अस्मिता की पहचान : बिद्रोह

मातृभाषा के प्रति प्रेम और सम्मान हमे अपनी संस्कृति से जोड़ता है। असम सरकार ने जब असमिया भाषा को राज्य की एकमात्र राजभाषा बनाने की घोषणा की तो बराक घाटी में बांग्लाभाषियों ने इसका विरोद्ध करते हुए भाषा आंदोलन शुरू किया।

असम की बराक घाटी में बंगला भाषा आंदोलन, असम सरकार के उस निर्णय के विरुद्ध एक विरोध प्रदर्शन था जिसमें असमिया को राज्य कि एकमात्र आधिकारिक भाषा घोषित किया गया था। जबकि जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा बंगाली भाषा था। बंगाली समाज के झारखंड प्रदेश अध्यक्ष बिद्रोह कुमार मित्रा ने कहा कि वर्ष 19 मई 1961 का दिन असमंजस में रहने वाले बंगालियों के लिए अपनी मातृभाषा की रक्षा करने के लिए मर मिटने वाला दिन था। इस दिन सिलचर समेत पूरा कछार जिला में सत्याग्रहियों ने अपनी मातृभाषा के लिए विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। इस विरोध प्रदर्शन को देखते हुए पुलिस और सेना हाई अलर्ट पर आ गए।

दूसरी ओर कछार की निहत्थी महिलाओं, पुरुष और बच्चों ने अपनी मांग को लेकर शांतिपूर्वक रेल परिचालन अवरूद्ध कर दिया। सत्याग्रहियों का एक और समुह सरकारी कार्यालयों के सामने धरना देने के लिए निकल पड़ा। उनका उद्देश्य ट्रेन को चलने से रोकना और कार्यालय को खुलने से रोकना था। वे सभी निहत्थे, शान्त और स्थिर थे, लेकिन अपनी मातृभाषा को बचाने के लिए दृढ़ थे। उनके होंठों पर नारे थे प्राण देबो, जबान देबो ना। वंदे मातरम, बांग्ला भाषा जिन्दाबाद।

आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा था। इस बीच दोपहर 2 बजे के बाद अचानक बिना किसी चेतावनी के स्टेशन परिसर पर बैठे सत्याग्रहियों पर पुलिस ने गोलियां चला दी। इन गोलियों में 11 लोगों की जान चली गई। मारें गए लोगों में कमला भट्टाचार्य, सचिंद्र पाल, चंडी चरण सूत्र धार, सुनील सरकार, सुकोमल पुरकायस्थ, कनाई लाल नेगी, तारणी देवनाथ, सत्येन्द्र देव, कुमुद रंजन दास, हितेश विश्वास, बीरेंद्र सूत्रधर शामिल थे। जिन्होंने असम राज्य के स्कूलों में प्रशासन और शिक्षा के माध्यम के लिए बंगला भाषा के बजाए असमिया भाषा को असम सरकार द्वारा आधिकारिक भाषा के रूप में लागू करने के फैसले का विरोध किया था।

इन शहीदों में 16 वर्षीय कमला भट्टाचार्य भी शामिल थी, जो विश्व इतिहास में अपनी मातृभाषा के लिए प्राण न्यौछावर करने वाली प्रथम महिला थी। इन युवकों ने अपनी मातृभाषा बोलने के अधिकार की रक्षा के लिए अपनी प्राणों की आहूति दी। इन मौतों ने आंदोलन को और भी ऊर्जा देने का काम किया।

19 मई के इस भाषा आंदोलन से उत्पन्न वीरतापूर्ण गौरव में उदासी का भी भाव निहित है, लेकिन यह उदासी 11 प्रदर्शनकारियों की शहादत, एक न्यायसंगत उद्देश्य के लिए बहाए गए उनके रक्त, बराक के लोक जीवन के प्रति उनके प्रेम और अन्ततः मृत्यु तक मातृभाषा बांग्ला के प्रति उनके प्रेम के माध्यम से व्यक्त होती है।

भाषाई सद्भाव के महत्व को समझते हुए असम सरकार ने तीन जिलों में काछार, करीमगंज और हैलाकंडी में बंगला भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल किया। इन जिलों में प्रशासनिक और सरकारी काम-काज के लिए बंगला भाषा का उपयोग किया जाता है। उस हिंसक आंदोलन के बाद से असम के तीन जिलों काछार करीमगंज और हैलाकाडी में रहने वाले लोग हर साल 19 मई को भाषा दिवस के रूप में याद करते हैं।

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