कविता : रावण का पश्चाताप
स्वर्ण नगरी लंका का राजा,
दस शीशों वाला अभिमानी,
ज्ञान, तपस्या, शक्ति का सागर,
पर बन बैठा वह अज्ञानी।
शिव का भक्त महान था रावण,
वेदों का ज्ञाता कहलाया,
किन्तु अहंकार की अग्नि में,
अपने जीवन को जलाया।
जब सीता का हरण किया था,
मन में गर्व का विष भरकर,
सोचा था संसार झुकेगा,
उसके चरणों में आ गिरकर।
किन्तु कौन जानता था आगे,
विनाश खड़ा मुस्काता है,
जब धर्म से कोई टकराए,
समय उसे समझाता है।
लंका के हर स्वर्ण महल में,
अब सन्नाटा बोल रहा था,
अंदर-अंदर रावण का मन,
धीरे-धीरे डोल रहा था।
रात अंधेरी जब होती थी,
नींद उसे भी ना आती थी,
सीता की करुणा की छाया,
उसके मन को तड़पाती थी।
मंदोदरी बार-बार कहती
त्यागो यह जिद, हे स्वामी,
राम कोई साधारण नर नहीं,
उनमें बसती शक्ति अविरामी।
विभीषण ने भी समझाया,
धर्म का मार्ग अपनाओ,
एक स्त्री के कारण अपने,
वंश को मत मिटवाओ।
पर अभिमान के ऊँचे पर्वत,
सत्य कहाँ सुन पाते हैं,
जो खुद को ईश्वर समझें,
वे शीश झुका ना पाते हैं।
युद्ध शुरू जब हुआ भयंकर,
धरती काँप उठी रण में,
एक-एक कर वीर गिरे सब,
लंका डूब गई क्रंदन में।
मेघनाद का शव जब देखा,
रावण का हृदय चटक गया,
कुम्भकर्ण की मृत्यु ने जैसे,
उसका साहस ही निगल लिया।
तब पहली बार दशानन की,
आँखों से आँसू निकले थे,
स्वर्ण सिंहासन पर बैठे भी,
वह भीतर से बिखरे थे।
आकाशों की ओर देखकर,
धीमे स्वर में वह रोया था
क्या पाया मैंने जीवन में?
सब कुछ तो मैंने खोया था।
ज्ञान मिला था शिव से मुझको,
तप का अनुपम वरदान मिला,
पर मेरे ही दंभ के कारण,
मुझको यह अपमान मिला।
काश! उसी दिन रुक जाता मैं,
जब पहली चेतावनी आई,
काश! पराई नारी को मैंने,
अपनी विजय नहीं बतलाई।
आज न लंका जलती मेरी,
ना पुत्रों का रक्त बहता,
ना मंदोदरी यूँ रोती,
ना मेरा कुल यूँ ढहता।
रणभूमि में जब राम सामने,
धनुष उठाए खड़े हुए थे,
रावण के भीतर पश्चाताप के,
अग्नि-सरोवर बड़े हुए थे।
उसने देखा राम के मुख में,
करुणा का उजियारा था,
विजयी होकर भी रघुवर को,
शत्रु से प्रेम ही प्यारा था।
तब टूटी रावण की हठधर्मी,
मन का अंधकार पिघल गया,
अंत समय में सत्य का सूरज,
उसके भीतर निकल गया।
धीमे स्वर में बोला रावण
राम, तुम सच में महान हो,
मैं हार गया अपने दोषों से,
तुम धर्म के भगवान हो।
मुझमें ज्ञान बहुत था लेकिन,
विवेक कहीं खो बैठा था,
अपने ही अभिमान की खातिर,
मैं मानवता भूल बैठा था।
राम ने तब शांत दृष्टि से,
रावण को निहारा था,
जैसे कोई गुरु अपने,
भटके शिष्य को सँवारा था।
धरती पर जब रावण गिरा,
लंका का वैभव रोया था,
पर उस अंतिम क्षण में शायद,
उसका मन सच में सोया था।
यह कथा हमें सिखलाती है
ज्ञान तभी सम्मानित है,
जब विनम्रता साथ रहे और,
मन धर्म से आलोकित है।
अहंकार चाहे कितना भी,
ऊँचा क्यों ना उठ जाए,
एक दिन उसका अंत निश्चित,
समय उसे झुकवाए।
रावण केवल राक्षस ना था,
वह मानव की भूल भी था,
जो शक्ति पाकर भूल गया कि,
सच्चा पथ ही मूल भी था।
इसलिए जीवन में अपने,
सत्य का दीप जलाना तुम,
क्रोध, घृणा और अभिमान से,
हर पल खुद को बचाना तुम।
वरना स्वर्णिम लंका भी फिर,
राख बनाकर रोएगी,
और पश्चाताप की अग्नि,
आत्मा को जीवन भर धोएगी।