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अद्ल व इंसाफ का मज़बूत सुतून: मारूफ़ क़ानून दाँ एडवोकेट ज़फ़रियाब जिलानी की तीसरी बरसी पर ख़ुसूसी तहरीरमलीहाबाद से अदालत-ए-आलिया तक: एक अज़ीम क़ानून द

अद्ल व इंसाफ का मज़बूत सुतून: मारूफ़ क़ानून दाँ एडवोकेट ज़फ़रियाब जिलानी की तीसरी बरसी पर ख़ुसूसी तहरीर

"ये हमारे हुक़ूक़ के तहफ़्फ़ुज़ का सवाल है। क्या सिर्फ इस वजह से कि वो अक्सरियत में हैं, हम अपने हुक़ूक़ से दस्तबरदार हो जाएँ?"
ज़फ़रियाब जिलानी (2010)

हिंदुस्तानी क़ानून दानों और मुस्लिम माशिरे को अपने एक इंतिहाई निडर और मुख़लिस रहनुमा से बिछड़े तीन साल का अरसा बीत चुका है। 16 मई 2023 को एडवोकेट ज़फ़रियाब जिलानी (रहमतुल्लाह अलैह) इस दार-ए-फ़ानी से रुख़सत हो गए, जिस की उन्होंने निस्फ़ सदी से ज़ाएद अरसे तक उंतहाक ख़िदमात अंजाम दीं। आज उनकी तीसरी बरसी के मौक़ा पर उनकी विरासत, दयानतदारी और इंसाफ़ परस्ती की मशअल पहले से कहीं ज़्यादा रौशन नज़र आती है।

मलीहाबाद से अदालत-ए-आलिया तक: एक अज़ीम क़ानून दाँ का सफ़र

उत्तर प्रदेश के तारीख़ी क़स्बे मलीहाबाद में 1950 को पैदा होने वाले ज़फ़रियाब जिलानी ग़ैर मामूली सलाहियतों के मालिक थे। एक छोटे से क़स्बे से निकल कर सुप्रीम कोर्ट के राहदारियों तक पहुँचने का उनका सफ़र उनकी मेहनत, मुस्तक़िल मिज़ाजी और इल्मी क़ाबिलियत का मुँह बोलता सुबूत है।

उन्होंने 1969 में एलएलबी और फिर 1971 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से गोल्ड मेडल के साथ एलएलएम की डिग्री हासिल की। जिलानी साहब ने लखनऊ में अपने वक़्त के नामवर सिविल वकील शफ़ीक़ुर्रहमान की सरपरस्ती में वकालत का आग़ाज़ किया। उनकी इल्मी क़ाबिलियत की वजह से जल्द ही उन्हें शिया डिग्री कॉलेज, लखनऊ में क़ानून पढ़ाने की दावत दी गई, जहाँ वो बाद में फ़ैकल्टी ऑफ़ लॉ के सरबराह भी बने।

लेकिन ज़फ़रियाब जिलानी की ज़िंदगी महज़ अदालत के कमरों तक महदूद रहने के लिए नहीं थी। उनके अंदर का समाजी कारकुन तालिबी ज़माने में ही बेदार हो चुका था। 1968 में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अकलियती किरदार के तहफ़्फ़ुज़ की तहरीक में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, और 1971 में अकलियती हुक़ूक़ की एक तहरीक में शामिल होने की पादाश में उन्हें तक़रीबन 28 दिन जेल में भी काटने पड़े। इन इब्तिदाई तजुर्बात ने उन पर वाज़ेह कर दिया था कि क़ानून महज़ एक पेशा नहीं, बल्का समाजी इंसाफ़ के हुसूल का एक अहम ज़रिया है।

ज़िंदगी का सबसे बड़ा मिशन: बाबरी मस्जिद मुक़द्दमा

ज़फ़रियाब जिलानी की ज़िंदगी और ख़िदमात का तज़किरा बाबरी मस्जिद मुक़द्दमे के बग़ैर नामुकम्मल हैजो आज़ाद हिंदुस्तान की तारीख़ की सबसे बड़ी और हसास तरीन क़ानूनी लड़ाई थी।

1986 में, नदवतुल उलमा के मुफ़क्किर-ए-इस्लाम मौलाना अली मियाँ नदवी की हिदायत पर, जिलानी साहब ने बाबरी मस्जिद तनाज़ा से मुताल्लिक़ फ़ाइलों का जाइज़ा लेना शुरू किया। दस्तावेज़ात का यह मुआयना देखते ही देखते 45 साला तवील क़ानूनी जद्दोजहद में तब्दील हो गया, जो उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मिशन बन गया। जब 1989 में हाईकोर्ट ने फ़ैज़ाबाद से तमाम मुक़द्दमात इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में मुंतक़िल किए, तो जिलानी साहब ने ख़ुद को मुकम्मल तौर पर इस मुक़द्दमे के लिए वक़्फ़ कर दिया।

निस्फ़ सदी के क़रीबयानी 1975 से लेकर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले तक और उसके बाद भीजिलानी साहब ने सुन्नी मरकज़ी वक्फ़ बोर्ड और मुस्लिम फ़रीक़ैन की ग़ैर मामूली लगन के साथ नुमाइंदगी की। वो सिर्फ एक वकील नहीं थे, बल्का जैसा कि उनके साथी कहते थे, वो बाबरी मस्जिद केस की "आँख और कान" बन चुके थे।

उनके दलाएल हमेशा तारीख़ी और क़ानूनी शवाहिद पर मबनी होते थे। उन्होंने मुतअद्दिद इंटरव्यूज़ में मुस्लिम फ़रीक का मौक़िफ़ इंतिहाई मज़बूती और बारीकबीनी के साथ पेश किया: "यह मस्जिद शहंशाह बाबर के दौर में 1528 में तामीर हुई थी और यहाँ कभी कोई मंदिर नहीं था; हिंदुओं ने 19वीं सदी के आख़िर तक इसे राम का जन्म स्थान होने का दावा नहीं किया था, और मुसलमान 22 दिसंबर 1949 की सियाह रात तक वहाँ बिलातअल्लुक नमाज़ अदा करते रहे थे।" उन्होंने 1885 में एक हिंदू पुजारी की तरफ़ से दायर किए गए नक़्शे का हवाला भी दिया जिसमें इमारत को 'मस्जिद' तस्लीम किया गया थाउनके नज़दीक यह एक ऐसा नाक़ाबिल-ए-तर्दीद सुबूत था जिसने सदियों परानी इबादत के दावे को मुस्तर्द कर दिया।

उसूल परस्ती और किरदार की बुलंदी: इक़्तिदार पर उसूलों को तरजीह

ज़फ़रियाब जिलानी के अख़लाक़ और किरदार का सबसे रौशन पहलू यह था कि उन्होंने ज़ाती मफ़ाद और इक़्तिदार के बड़े से बड़े उहदों को अपने उसूलों पर क़ुरबान कर दिया।

1980 में संजय गांधी के एक फ़ौजदारी मुक़द्दमे में नुमाइंदगी करने के बाद, कांग्रेस पार्टी ने उन्हें लोकसभा इंतेख़ाबात लड़ने के लिए टिकट की पेशकश की। उन्होंने इंकार कर दियाअव्वल तो वो सियासी धड़ेबंदियों से दूर रहना चाहते थे, और दोम उनके पास इंतेख़ाबी अख़राजात के वसाइल नहीं थे। बाद में उन्हें राज्यसभा की निशस्त की पेशकश की गई, लेकिन इस बार कांग्रेस ने एक शर्त रखी कि वो बाबरी मस्जिद के मामले पर पार्टी लाइन से बाहर नहीं जाएँगे। जिलानी साहब ने उस पेशकश को भी ठुकरा दिया।

उनके भाई मसूद जिलानी याद करते हैं: "उन्होंने साफ़ कह दिया था कि वो पार्लियामेंट की एक सीट के लिए हिंदुस्तानी मुसलमानों के सबसे अहम मुक़द्दमे का सौदा नहीं कर सकते।"

यहाँ तक कि उन्हें हाईकोर्ट में जज के उहदे की भी पेशकश हुई, मगर उन्होंने इंकार कर दिया। जिलानी साहब ने ज़ाती ऐशो आराम और वक़ार के मुक़ाबले में वकालत, समाजी सरगर्मी और मिल्लत के हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त के मुश्किलतरीन रास्ते का इंतेख़ाब किया।

अदालत से बाहर: एक हक़ीक़ी मिल्ली रहनुमा

जिलानी साहब की ख़िदमात सिर्फ अदालती मैदान तक महदूद नहीं थीं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के सेक्रेटरी और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के कन्वीनर की हैसियत से, वो हिंदुस्तानी मुसलमानों के हर बड़े मसले में सफ़-ए-अव्वल में खड़े रहेचाहे वो 1985 का शाहबानो केस हो या अकलियती तालीमी इदारों का तहफ़्फ़ुज़।

समाजी महाज़ पर, उन्होंने इस्लामिया कॉलेज लखनऊ के मैनेजर के तौर पर ख़िदमात अंजाम दीं और एक एनजीओ (NGO) भी चलाई जिसके तहत यतीमख़ाना और डिग्री कॉलेज क़ाएम किए गए। वो हर लिहाज़ से एक सच्चे मिल्ली रहनुमा थे जिन्होंने अपने ज़ाती मफ़ाद को पुश्त-ए-पुश्त डालकर मुसलमानों के मसाइल के हल के लिए अपनी ज़िंदगी वक़्फ़ कर दी।

उनके क़रीबी साथी और सीनियर एडवोकेट एस. एफ. ए. नक़वी उन्हें याद करते हुए कहते हैं: "वो इंतिहाई नरम-गुफ़्तार और रहम-दिल इंसान थे, उनकी शख़्सियत में एक ऐसा वक़ार था जिसे अल्फ़ाज़ में बयान करना मुश्किल है। लेकिन अदालत में उनके दलाएल कभी नरम नहीं होते थे, क़ानून उनकी उंगलियों के पोरों पर होता था।"

आख़िरी क़ानूनी लड़ाई: 2019 के फ़ैसले के बाद

जब 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने तारीख़ी फ़ैसला सुनाते हुए मुतनाज़े ज़मीन राम मंदिर की तामीर के लिए देने और मुसलमानों को मस्जिद के लिए मुतबादिल पाँच एकड़ ज़मीन फ़राहम करने का हुक्म दिया, तो बहुत से लोगों का ख़याल था कि यह क़ानूनी लड़ाई ख़त्म हो गई।

जिलानी साहब ने फ़ैसले का एहतेराम करते हुए भी इसका हक़ीक़त-पसंदाना जाइज़ा लिया और कहा: "अदालत का यह फ़ैसला तारीख़ी हक़ाइक़ की ग़लत तशरीह पर मबनी है।" उन्होंने पर्सनल लॉ बोर्ड के अरकान पर ज़ोर दिया कि इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ नज़रसानी की दरख़्वास्त (Review Petition) दायर की जानी चाहिए, क्योंकि "जब वो दुनिया से रुख़सत हों और ख़ुदा की बारगाह में उनसे सवाल हो, तो उनके पास यह जवाब होना चाहिए कि उन्होंने इंसाफ़ का आख़िरी क़ानूनी दरवाज़ा खटखटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।"

नज़रसानी की दरख़्वास्त दायर की गई और मुस्तर्द हो गई, लेकिन जिलानी साहब का यह इसरार क़ानून की बालादस्ती पर उनके ग़ैर-मुतज़ल्ज़िल ईमान और इंसाफ़ के हुसूल के लिए आख़िरी हद तक जाने के अज़्म का अक्कास था।

वह विरासत जो हमेशा ज़िंदा रहेगी

ज़फ़रियाब जिलानी 16 मई 2023 को लखनऊ के एक हॉस्पिटल में 73 बरस की उम्र में इंतिक़ाल कर गए। वो तवील अरसे से अलील थे और 2021 में ब्रेन हैमरेज का शिकार हुए थे। उनके पसमंदगान में अहलिया अज़रा ज़फ़र, बेटी मारिया ज़फ़र और दो बेटे नजम ज़फ़र और अनस ज़फ़र शामिल हैं।

उनके क़रीबी साथी उनकी उंतहाक मेहनत को याद करते हुए बताते हैं: "वो रात के 4 बजे तक केस पर काम करते थे और फिर सुबह 8 बजे दोबारा तैयार मिलते थे। बाज़ औक़ात हम उनकी तवानाई देख कर शर्मिंदा हो जाते थे जब हम थक कर सोना चाहते थे और वो मुसलसल काम कर रहे होते थे।"

सुप्रीम कोर्ट के नामवर वकील एम. आर. शमशाद, जिन्होंने बाबरी मस्जिद मुक़द्दमे में जिलानी साहब के साथ काम किया, उनकी ख़िदमात का ख़ुलासा इन अल्फ़ाज़ में करते हैं: "बाबरी मस्जिद मुक़द्दमे में उनका तआवुन बेमिसाल था। बाबरी मस्जिद की तारीख़ उनके ज़िक्र के बग़ैर हमेशा नामुकम्मल रहेगी। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इस बात को यक़ीनी बनाने के लिए वक़्फ़ कर दी कि मिल्लत के मुक़द्दमात पूरी दयानतदारी और मज़बूती से लड़े जाएँ।"

पैग़ाम और तजदीद-ए-अहद

आज उनकी तीसरी बरसी के मौक़ा पर हमारा मक़सद सिर्फ आँसू बहाना नहीं, बल्कि उनके नक़्श-ए-क़दम पर चलना है। इक़्तिदार और लालच के सामने अपने उसूलों पर क़ायम रहकर उनकी दयानतदारी को ज़िंदा रखना है। जिस उंतहाक तवानाई के साथ उन्होंने 45 साल तक मज़लूमों की लड़ाई लड़ी, उसी जज़्बे के साथ इंसाफ़ की जद्दोजहद को जारी रखना है। और क़ानूनी, परवक़ार और पर-अमन तरीक़ों से अकलियतों के हुक़ूक़ की आवाज़ को बुलंद रखना है।

ज़फ़रियाब जिलानी ने एक बार तारीख़ी जुमला कहा था: "मस्जिद फ़रोख़्त के लिए नहीं है।" यह बयान सिर्फ ज़मीन के एक टुकड़े के बारे में नहीं था, बल्कि यह इज़्ज़त-ए-नफ़्स, तारीख़ी सच्चाई और इस उसूल का एलान था कि अक्सरियत की तादाद के बल-बूते पर अकलियत के हुक़ूक़ को मिटाया नहीं जा सकता।

अल्लाह तआला उनके दरजात बुलंद फ़रमाए। उनकी ज़िंदगी हमारे आने वाले क़ानून दानों, समाजी कारकुनों और शहरियों के लिए शुजाअत, वक़ार और ईमान की एक ऐसी मिसाल बनी रहे जो कभी धुंधली न हो।

"ऐ अल्लाह! उनकी नेकियों को क़बूल फ़रमा, उनकी लगज़िशों से दरगुज़र फ़रमा, और उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना। आमीन।"

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