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भक्ति

जीवन में जो बिना मांगे मिलता है, वह पिछले जन्मों का संचित पुण्य है, भारतीय दर्शन और कर्म सिद्धांत की गहरी जड़ों से जुड़ा है। इसे समझने के लिए संत एकनाथ के जीवन की एक बहुत ही सुंदर और प्रचलित कहानी है, जो 'अदृश्य ऋण' और 'संचित पुण्य' के प्रभाव को बखूबी दर्शाती है।

महाराष्ट्र के महान संत एकनाथ जी भगवान के अनन्य भक्त थे। वे अत्यंत दयालु और शांत स्वभाव के थे। उनके जीवन की यह घटना हमें बताती है कि कैसे हमारे पुण्य कर्म ईश्वर को भी हमारा ऋणी बना देते हैं।

एक बार एक साधारण सा दिखने वाला ब्राह्मण एकनाथ जी के पास आया और अपना नाम 'खंड्या' बताया। उसने कहा कि वह उनके घर के काम और पूजा-पाठ की तैयारी में मदद करना चाहता है। एकनाथ जी ने कहा कि उनके पास उसे देने के लिए धन नहीं है, लेकिन खंड्या ने मुस्कुराते हुए कहा, "मुझे धन नहीं, बस आपका सानिध्य चाहिए।"

खंड्या ने अगले 12 वर्षों तक एकनाथ जी के घर में पानी भरने, सफाई करने और चन्दन घिसने जैसे तुच्छ माने जाने वाले काम किए। उसने कभी कुछ नहीं मांगा, कभी शिकायत नहीं की। उसे जो भी रूखा-सूखा मिलता, वह उसी में प्रसन्न रहता। एकनाथ जी को भी महसूस होता था कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है, क्योंकि उसकी सेवा में एक अद्भुत दिव्यता थी।

एक दिन एक अन्य भक्त द्वारका से आया और उसने एकनाथ जी को बताया कि उसने स्वप्न में देखा है कि स्वयं भगवान विट्ठल (श्री कृष्ण) एकनाथ जी के घर में 'खंड्या' के रूप में सेवा कर रहे हैं। जब एकनाथ जी खंड्या के पास यह पूछने दौड़े, तो वह अंतर्धान (गायब) हो गया।
इस कहानी से हमें दो बड़ी सीख मिलती हैं
पुण्य का फल: एकनाथ जी ने इस जन्म में भगवान से सेवा नहीं मांगी थी। लेकिन उनके पिछले जन्मों और इस जन्म के संचित पुण्यों का भंडार इतना बड़ा था कि स्वयं ईश्वर उनके ऋणी हो गए और बिना मांगे उनकी सेवा करने आ गए।
अदृश्य व्यवस्था: ब्रह्मांड में कुछ भी मुफ्त नहीं है। अगर आज आपको बिना प्रयास के प्रेम, सम्मान या सुविधाएं मिल रही हैं, तो वह आपके उन अच्छे कर्मों का "ब्याज" है जो आपने कभी निस्वार्थ भाव से किए थे।

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