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*राहुल गांधी बन पाएंगे इंडिया गठबंधन का प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वमान्य चेहरा?* *चंद्रहास, पत्रकार, दिल्ली।*

*राहुल गांधी बन पाएंगे इंडिया गठबंधन का प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वमान्य चेहरा?*
*चंद्रहास, पत्रकार, दिल्ली।*

कांग्रेस नेता और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने राहुल गांधी को विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक का संभावित प्रधानमंत्री चेहरा बताए जाने के बाद राष्ट्रीय राजनीति में एक नई बहस शुरू हो गई है। यह बहस केवल एक व्यक्ति की स्वीकार्यता की नहीं, बल्कि विपक्ष की भविष्य की दिशा, नेतृत्व क्षमता और क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक मजबूरियों की भी है। सवाल यह है कि क्या इंडिया गठबंधन के सभी सहयोगी दल राहुल गांधी के नेतृत्व को सहजता से स्वीकार करेंगे? क्या अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव, हेमंत सोरेन, शरद पवार, उद्धव ठाकरे, उमर अब्दुला और एमके स्टालिन जैसे अन्य नेता राहुल गांधी को अपना सर्वमान्य नेता मानने को तैयार होंगे?

भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि विपक्षी गठबंधन केवल विचारधारा से नहीं, बल्कि राजनीतिक परिस्थितियों और सत्ता की संभावनाओं से बनते हैं। आज विपक्ष के अधिकांश क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में दबाव में हैं। कई दल सत्ता से बाहर हैं, कई दलों का जनाधार कमजोर हुआ है और कई नेताओं पर राजनीतिक अस्तित्व का संकट है। ऐसे में कांग्रेस की अगुवाई वाले इंडिया गठबंधन की छतरी उनके लिए राजनीतिक सुरक्षा कवच बनती दिखाई देती है।

सबसे पहले कांग्रेस की स्थिति को समझना जरूरी है। 2014 और 2019 की हार के बाद कांग्रेस कमजोर जरूर हुई, लेकिन वह आज भी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के मुकाबले एकमात्र ऐसी पार्टी है। जिसकी देशव्यापी उपस्थिति है। दक्षिण भारत में कांग्रेस मजबूत हुई है, कर्नाटक और तेलंगाना में सत्ता में है। केरलम में सरकार बन रही है। तमिलनाडु और झारखंड में सरकार के सहयोगी की भूमिका में है। जबकि उत्तर भारत में भी वह धीरे-धीरे अपनी जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है।

राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्राओं ने उनकी राजनीतिक छवि में बदलाव लाने का काम किया है। पहले जिस नेता को विपक्ष भी गंभीरता से नहीं लेता था, आज वही भाजपा के खिलाफ विपक्षी राजनीति का केंद्रीय चेहरा बन चुके हैं।
बीते कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में एक और बड़ा बदलाव दिखाई दिया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सड़क से लेकर संसद तक यदि कोई नेता लगातार सीधे चुनौती देता दिखाई पड़ा है, तो वह राहुल गांधी हैं। चाहे मुद्दा बेरोज़गारी का हो, महंगाई का, किसानों का, युद्ध और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का, चुनावी पारदर्शिता का या घरेलू आर्थिक नीतियों का मुद्दा हो, राहुल गांधी ने लगातार सरकार को आक्रामक तरीके से घेरने की कोशिश की है। यही कारण है कि आज की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच वैचारिक टकराव का सबसे प्रमुख चेहरा राहुल गांधी बन गए हैं। विपक्षी राजनीति में यह स्थिति उन्होंने धीरे-धीरे अपने राजनीतिक संघर्ष और निरंतर सक्रियता से बनाई है। संसद के भीतर उनके भाषण हों या सड़क पर आंदोलन, राहुल गांधी अब केवल कांग्रेस नेता नहीं, बल्कि भाजपा विरोधी राजनीति की सबसे प्रमुख आवाज़ के रूप में स्थापित होते दिखाई दे रहे हैं, लेकिन राजनीति केवल छवि और आक्रामकता से नहीं चलती, सत्ता समीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।

इंडिया गठबंधन के भीतर सबसे बड़ी चुनौती नेतृत्व की है। क्षेत्रीय दलों के नेता अपने-अपने राज्यों में बड़े जनाधार वाले नेता हैं। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में निर्विवाद शक्ति हैं। अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में भाजपा के सबसे बड़े चुनौतीकर्ता के रूप में खुद को स्थापित करना चाहते हैं। स्टालिन तमिलनाडु में मजबूत हैं। तेजस्वी यादव बिहार में भविष्य की राजनीति के केंद्र माने जाते हैं। ऐसे में कोई भी क्षेत्रीय नेता खुलकर यह स्वीकार नहीं करना चाहेगा कि कांग्रेस का नेतृत्व सर्वोपरि है।

यही कारण है कि अब तक इंडिया गठबंधन ने प्रधानमंत्री चेहरे की औपचारिक घोषणा से दूरी बनाए रखी है। विपक्ष जानता है कि चेहरा घोषित होते ही कई दलों के भीतर असहजता बढ़ सकती है। ममता बनर्जी और अन्य क्षेत्रीय नेताओं ने समय-समय पर कांग्रेस नेतृत्व को लेकर अपनी अलग राय रखी है। शरद पवार हमेशा से सर्वसम्मति आधारित विपक्ष की राजनीति के पक्षधर रहे हैं। ऐसे में राहुल गांधी के नाम पर पूर्ण सहमति फिलहाल आसान नहीं दिखती।

हालांकि राजनीति में परिस्थितियां विचारधारा से बड़ी होती हैं। यदि भविष्य के चुनावों में भाजपा के खिलाफ मजबूत जनभावना बनती है और कांग्रेस सीटों के लिहाज से विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती है, तब क्षेत्रीय दलों के पास राहुल गांधी को स्वीकार करने के अलावा बहुत अधिक विकल्प नहीं होंगे। भारतीय राजनीति में यह परंपरा रही है कि गठबंधन का नेतृत्व वही दल करता है जिसके पास सबसे अधिक सांसद होते हैं। 2004 में कांग्रेस कमजोर होने के बावजूद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की धुरी बनी थी क्योंकि उसके पास राष्ट्रीय विस्तार था।

आज क्षेत्रीय दलों की अपनी सीमाएं भी हैं। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश से बाहर प्रभावी नहीं है। तृणमूल कांग्रेस बंगाल तक सीमित है। राजद बिहार से आगे नहीं बढ़ पाई। डीएमके तमिलनाडु आधारित दल है। ऐसे में राष्ट्रीय सत्ता तक पहुंचने के लिए इन दलों को कांग्रेस की आवश्यकता है। भाजपा के मुकाबले अकेले लड़ना इनके लिए कठिन होता जा रहा है। यही वजह है कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद ये दल इंडिया गठबंधन के साथ बने हुए हैं।

राहुल गांधी की स्वीकार्यता का दूसरा पक्ष यह भी है कि वे क्षेत्रीय नेताओं के लिए अपेक्षाकृत कम खतरे वाले नेता माने जाते हैं। कांग्रेस अब पहले जैसी प्रभुत्वशाली स्थिति में नहीं है, इसलिए क्षेत्रीय दलों को यह भरोसा रहता है कि गठबंधन में उनकी भूमिका बनी रहेगी। यही कारण है कि कई क्षेत्रीय दल भाजपा की तुलना में कांग्रेस के साथ अधिक सहज दिखाई देते हैं।
फिर भी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सभी दल पूरी निष्ठा के साथ राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार कर चुके हैं। राजनीति में अंतिम निर्णय चुनाव परिणाम तय करते हैं। यदि कांग्रेस मजबूत होकर उभरती है तो राहुल गांधी स्वाभाविक दावेदार होंगे। लेकिन यदि क्षेत्रीय दलों का प्रदर्शन बेहतर रहता है, तब प्रधानमंत्री चेहरे को लेकर अंदरूनी खींचतान बढ़ सकती है।

वहीं, इस पूरे घटनाक्रम में एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि विपक्ष की राजनीति अब कांग्रेस बनाम क्षेत्रीय दल की नहीं, बल्कि भाजपा बनाम संयुक्त विपक्ष की दिशा में बढ़ रही है। ऐसे में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से अधिक महत्व सत्ता संतुलन और राजनीतिक अस्तित्व का होगा। क्षेत्रीय दल जानते हैं कि अलग-अलग लड़ाई लड़कर भाजपा को चुनौती देना मुश्किल है। इसलिए मजबूरी और संभावना दोनों हैं कि उन्हें कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन के करीब ला रही हैं।

अब आने वाले समय में राहुल गांधी की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि क्या वह केवल कांग्रेस नेता से आगे बढ़कर पूरे विपक्ष के सर्वमान्य चेहरे बन पाते हैं। यदि वे क्षेत्रीय दलों को सम्मानजनक भागीदारी, राजनीतिक भरोसा और साझा नेतृत्व का मॉडल दे पाए, तो इंडिया गठबंधन में उनकी स्वीकार्यता स्वतः बढ़ेगी। लेकिन यदि कांग्रेस पुरानी बड़ी पार्टी वाली मानसिकता में लौटती है, तो विपक्षी एकता फिर बिखर सकती है।

फिलहाल इतना तय है कि अब विपक्ष की राजनीति में राहुल गांधी केंद्र में हैं, लेकिन क्या वह सर्वसम्मति के नेता बन पाएंगे। इसका फैसला राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि आने वाले चुनाव और सत्ता का गणित तय करेगा।

*Devashish Govind Tokekar*
*VANDE Bharat live tv news Nagpur*
Editor/Reporter/Journalist
RNI:- MPBIL/25/A1465
*Indian Council of press,Nagpur*
Journalist Cell
*All India Media Association
Nagpur*
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*Delhi Crime Press*
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AD.Associate /Reporter
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