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ई. वी. रामासामी पेरियार और डॉ. अब्दुल जलील फ़रीदी एक दक्षिण भारत का शेर, दूसरा उत्तर भारत का उभरता हुआ किला

ई. वी. रामासामी पेरियार और डॉ. अब्दुल जलील फ़रीदी
एक दक्षिण भारत का शेर, दूसरा उत्तर भारत का उभरता हुआ किला

भारत के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में कुछ ऐसी महान हस्तियाँ गुज़री हैं जिन्होंने केवल राजनीति ही नहीं की, बल्कि दबे-कुचले, वंचित और मज़लूम तबकों को आवाज़, चेतना और हौसला भी दिया।

यदि दक्षिण भारत में पेरियार एक गरजता हुआ शेर थे, तो उत्तर भारत में डॉ. अब्दुल जलील फ़रीदी एक मज़बूत वैचारिक किले के रूप में उभरे।

पेरियार ने दक्षिण भारत में जाति व्यवस्था, ब्राह्मणवाद और सामाजिक गुलामी के विरुद्ध विद्रोह की मशाल जलाई। उन्होंने इंसान को इंसान समझने की शिक्षा दी और पिछड़े वर्गों को सिर उठाकर जीने का साहस दिया। उनकी आवाज़ केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे भारत में सामाजिक न्याय की पहचान बन गई।

वे कहा करते थे कि सम्मान, शिक्षा और प्रतिनिधित्व हर इंसान का अधिकार है।

दूसरी ओर डॉ. अब्दुल जलील फ़रीदी ने उत्तर भारत में मुसलमानों, दलितों और पिछड़े वर्गों की राजनीतिक उपेक्षा को महसूस किया। उन्होंने मुस्लिम मजलिस के माध्यम से ऐसी राजनीति की नींव रखी जिसमें केवल सत्ता नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय मुख्य उद्देश्य था।

उन्होंने इस सोच को आगे बढ़ाया कि यदि वंचित वर्ग एकजुट हो जाएँ, तो भारत की राजनीति की दिशा बदल सकती है।

यह केवल संयोग नहीं है कि दोनों नेताओं की विचारधारा में कई समानताएँ दिखाई देती हैं।

दोनों ने शक्तिशाली वर्गीय व्यवस्था को चुनौती दी, दोनों ने कमज़ोरों की आवाज़ बुलंद की, और दोनों ने शिक्षा तथा राजनीतिक चेतना को आज़ादी की बुनियाद माना।

पेरियार दक्षिण भारत में स्वाभिमान आंदोलन की पहचान थे, जबकि फ़रीदी उत्तर भारत में राजनीतिक जागरूकता के प्रतीक बने।

एक ने द्रविड़ भूमि में सामाजिक क्रांति की नींव रखी, तो दूसरे ने गंगा-जमुनी तहज़ीब की धरती पर वंचित वर्गों की एकता का सपना देखा।

आज भी जब सामाजिक न्याय, दलित-मुस्लिम एकता, पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व और समानता की बात होती है, तब पेरियार और फ़रीदी जैसे नेता याद आते हैं।

ये दोनों महान व्यक्तित्व इस सच्चाई की पहचान हैं कि भारत की असली ताकत महलों और सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि उन लोगों में है जो अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखते हैं।

इतिहास उन्हें केवल दो राजनेताओं के रूप में नहीं, बल्कि दो मज़बूत किलों के रूप में याद रखेगा;

एक दक्षिण भारत का शेर,
और दूसरा उत्तर भारत की जागृत आवाज़।

इन्हीं महान महापुरुषों के विचारों और संघर्ष की परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य क़ायदे सानी इलियास आज़मी ने किया, जिन्होंने पेरियार और डॉ. अब्दुल जलील फ़रीदी के नक्शे-कदम पर चलते हुए सामाजिक न्याय, बराबरी और वंचित समाज की आवाज़ को मज़बूती देने का संकल्प लिया।

उन्होंने इस विचारधारा को केवल शब्दों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जनआंदोलन का रूप देने का प्रयास किया। इसी उद्देश्य के साथ पीपुल्स जस्टिस पार्टी के रूप में एक ऐसा रास्ता प्रस्तुत किया गया, जो दलितों, मुसलमानों, पिछड़ों और तमाम मज़लूम तबकों को सम्मान, प्रतिनिधित्व और न्याय दिलाने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है।

यह केवल एक राजनीतिक संगठन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, आत्मसम्मान और इंसाफ़ की उस मशाल का नाम है, जिसे पेरियार और डॉ. फ़रीदी जैसे महान नेताओं ने जलाया था।

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