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देश हित में राजनेताओं के वेतन, पेंशन और संपत्ति पर पुनर्मूल्यांकन

भारत: देश में आर्थिक चुनौतियों के बीच नेताओं के वेतन, पेंशन और धार्मिक संपत्तियों को लेकर चर्चा तेज हुई है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सरकार और जनता का रिश्ता विश्वास और पारदर्शिता पर आधारित होता है। सोशल मीडिया पर नेताओं के वेतन, पेंशन और मंदिरों की संपत्ति को लेकर बहस इस जन-भावना को दर्शाती है। कई बड़े मंदिर राज्य सरकारों के नियंत्रण वाले बोर्ड के तहत आते हैं, और उनका राजस्व सीधे सरकारी खजाने में नहीं जाता बल्कि मंदिर ट्रस्ट के खातों में रहता है। पूर्व में लागू गोल्ड मुद्रीकरण योजना का उद्देश्य निष्क्रिय सोने को अर्थव्यवस्था में तरलता लाना था, जिसमें सोना सरकार का नहीं बल्कि बैंक का होता है।

देश के संकट काल में सांसदों और विधायकों के वेतन में कटौती की मांग न्यायसंगत है। 2020 में कोरोना महामारी के दौरान प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मंत्रियों और सांसदों के वेतन में 30% की कटौती की गई थी, जिसका नैतिक संदेश महत्वपूर्ण था। इसके अलावा, पेंशन को लेकर जनता में असंतोष है कि 5 साल का कार्यकाल पूरा करने वाले पूर्व जनप्रतिनिधियों को आजीवन पेंशन देना उचित नहीं है। सरकारी कर्मचारियों के मुकाबले नेताओं को कम सेवा अवधि में पेंशन मिलना, और मल्टीपल पेंशन का लूपहोल जनता की मांग को और मजबूत करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'मन की बात' कार्यक्रम में जनता चाहती है कि राजनेताओं की फिजूलखर्ची, वेतन कटौती, पेंशन सुधार और वीआईपी कल्चर पर खुलकर चर्चा हो ताकि राजनीति को पुनः 'राष्ट्र सेवा' का माध्यम बनाया जा सके।

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