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*ट्रैक्टर चालक पराली के बदले ही किसानों की सरसों निकाल रहे* *सरसों की पराली से किसानों की बढ़ रही आय, ईंट भट्टों को मिल रहा सस्ता ईंधन*

*ट्रैक्टर चालक पराली के बदले ही किसानों की सरसों निकाल रहे*
*सरसों की पराली से किसानों की बढ़ रही आय, ईंट भट्टों को मिल रहा सस्ता ईंधन*

खैरथल हीरालाल भूरानी
कभी किसानों के लिए सिरदर्द मानी जाने वाली सरसों की पराली (पदाड़ी) अब कमाई का जरिया बन गई है। जिस पराली को पहले किसान खेतों में जलाने को मजबूर थे, वही अब ये पराली ईंट भट्टों के लिए सस्ता और असरदार ईंधन बन चुकी है। इससे किसानों को राहत मिली है तो ट्रैक्टर चालकों की कमाई भी कई गुना बढ़ गई है।
पहले सरसों निकलवाने के लिए किसानों को ट्रैक्टर चालक को करीब 1300 रुपए प्रति घंटे के हिसाब से भुगतान करना पड़ता था। दो घंटे में 20-22 क्विंटल सरसों निकलती थी और किसान करीब 2600 रुपए खर्च करता था। इसके बाद खेत में बची पराली को हटाने या जलाने की अलग परेशानी रहती थी। अब हालात पूरी तरह बदल गए हैं। ईंट भट्टों में पराली की मांग बढ़ने के बाद ट्रैक्टर चालक पराली के बदले ही किसानों की सरसों निकाल रहे हैं, साथ ही प्रति बीघा के हिसाब से एक हजार रुपये यानी किसानों को अब सरसों निकलवाने के लिए जेब से पैसा नहीं देना पड़ रहा है। ट्रैक्टर चालक सरसों के साथ निकलने वाली पराली को 300 से 400 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से ईंटभट्टा संचालकों को बेच रहे हैं। पहले जहां दो घंटे ट्रैक्टर चलाकर किसान से 2600 रुपए मिलते थे, वहीं अब करीब 30 क्विंटल पराली बेचकर 10 से 12 हजार रुपए तक की कमाई हो रही है।
*ईंट भट्टों पर इसलिए बढ़ी मांगः*
ईंटभट्टा संचालकों के अनुसार सरसों की पराली तेलीय होने के कारण तेजी से आग पकड़ती है और ईंट पकाने में बेहतर ईंधन साबित हो रही है। पहले एक लाख ईंट तैयार करने में ईंधन पर 25 से 30 हजार रुपए खर्च होते थे, जो अब घटकर 20 हजार रुपए रह गए हैं। किसान सुरेन्द्र सिंह का कहना है कि पहले पराली खेतों में जलानी पड़ती थी। अब थ्रेसर वाले सरसों की पराली के बदले सरसों निकाल देते हैं। साथ ही एक हजार रुपये भी देते हैं। इससे खेती की लागत में कमी आई है। किसान वीरसिंह का कहना है कि थ्रेसर वाला सरसों पराली के बदले सरसों भी निकाल देते है, सरसों निकलवाने में जो लेबर लगती हैं वह भी थ्रेसर वाले की होती हैं।
*फोटो कैप्शन -- एक खेत में एकत्रित सरसों की पराली*

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