कृष्ण और सुदामा की कथा
भक्ति की नहीं मैत्री की कथा है।
समस्या यह हुई कि बाद के लोगों ने
हर प्रेम को धर्म बना दिया,
हर मित्र को भगवान बना दिया
कृष्ण और सुदामा की कथा
भक्ति की नहीं मैत्री की कथा है।
समस्या यह हुई कि बाद के लोगों ने
हर प्रेम को धर्म बना दिया,
हर मित्र को भगवान बना दिया,
और हर संबंध को ऊँच-नीच में बाँट दिया।
सुदामा जब कृष्ण से मिलने जाते हैं,
तो वे किसी मंदिर में दर्शन करने नहीं जाते
वे अपने बचपन के मित्र से मिलने जाते हैं।
वहाँ कोई भक्त और भगवान का संबंध नहीं,
वहाँ दो आत्माओं का अपनापन है।
कृष्ण भी सुदामा को देखकर
राजा की तरह आदेश नहीं देते,
वे दौड़कर गले लगते हैं।
यदि केवल भगवान होने का अहंकार होता,
तो वे सिंहासन पर बैठे रहते।
लेकिन प्रेम सिंहासन नहीं देखता।
यही कारण है कि कथा में
सबसे बड़ा दृश्य चमत्कार नहीं,
बल्कि कृष्ण का सुदामा के पैर धोना है।
वहाँ सत्ता झुक रही है,
मित्रता जीत रही है।
Vedanta-2-0 सार यही है कि
सच्चा प्रेम समानता में जन्मता है,
डर और दासता में नहीं।
अंधी भक्ति अक्सर व्यक्ति को छोटा बना देती है।
वह कहती है
मैं तुच्छ हूँ, तू महान है।
लेकिन मैत्री कहती है
हम अलग नहीं हैं।
शायद इसी कारण कृष्ण के निकट रहने वाले लोग
उन्हें केवल भगवान नहीं,
सखा भी कहते थे।
Bhagavad Gita में भी अर्जुन के लिए कृष्ण केवल उपदेशक नहीं, सखा हैं।
लेकिन एक बात और भी गहरी है
कृष्ण में दोनों आयाम साथ हैं।
जो प्रेम से आया, उसके लिए वे मित्र हैं।
जो भय से आया, उसके लिए भगवान बन गए।
दृष्टि संबंध तय करती है।
कृष्ण जानते थे कि सुदामा भी मैं ही हूँ।
यहीं अद्वैत की सुगंध है।
जहाँ दूसरा बचता ही नहीं,
वहाँ भक्ति भी रूप बदलकर प्रेम बन जाती है।
vedanta-2-0