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डॉलर के मुकाबले रूपये का मूल्यांकन

डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत कैसे तय होती है?

जब हम कहते हैं कि 1 डॉलर = 83 रुपये या 1 डॉलर = 85 रुपये, तो इसका मतलब होता है कि एक अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए हमें कितने भारतीय रुपये देने पड़ेंगे। इसे ही डॉलर-रुपया विनिमय दर या Exchange Rate कहा जाता है।

भारत में डॉलर की कीमत कोई एक व्यक्ति, दुकान या सरकार रोज बैठकर तय नहीं करती। यह कीमत मुख्य रूप से बाज़ार में डॉलर की माँग और सप्लाई से तय होती है। भारत का सिस्टम आम तौर पर managed floating exchange rate माना जाता है, यानी रेट बाजार से तय होता है, लेकिन बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव हो तो RBI दखल दे सकता है। भारत में 1993 से रुपये की विनिमय दर को बाजार-आधारित व्यवस्था की ओर लाया गया था।

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1. सबसे पहले समझिए: डॉलर की जरूरत किसे पड़ती है?

भारत में डॉलर की मांग कई कारणों से होती है:

1. आयात करने वालों को
भारत जब विदेश से कच्चा तेल, सोना, मशीनें, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयों का कच्चा माल आदि खरीदता है, तो ज्यादातर भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। इसलिए आयातक रुपये देकर डॉलर खरीदते हैं।

2. विदेश यात्रा और पढ़ाई के लिए
जो लोग अमेरिका या दूसरे देशों में पढ़ाई, इलाज, यात्रा या फीस के लिए पैसा भेजते हैं, उन्हें डॉलर या विदेशी मुद्रा चाहिए होती है।

3. विदेशी कर्ज चुकाने के लिए
कई कंपनियों ने डॉलर में कर्ज लिया होता है। जब वे कर्ज या ब्याज चुकाती हैं, तो उन्हें डॉलर खरीदना पड़ता है।

4. निवेश निकालने पर
जब विदेशी निवेशक भारत के शेयर बाजार या बॉन्ड बाजार से पैसा निकालते हैं, तो वे रुपये को डॉलर में बदलकर वापस ले जाते हैं।

यानी जब डॉलर की मांग बढ़ती है, तो डॉलर महंगा हो सकता है और रुपया कमजोर हो सकता है।

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2. डॉलर भारत में आता कहाँ से है?

भारत में डॉलर आने के भी कई रास्ते हैं:

1. निर्यात से
जब भारत विदेशों को सामान या सेवाएँ बेचता हैजैसे सॉफ्टवेयर, दवाइयाँ, कपड़े, इंजीनियरिंग सामानतो विदेश से डॉलर आते हैं।

2. IT और सर्विस सेक्टर से
भारत की IT कंपनियाँ विदेशी ग्राहकों से कमाई करती हैं। यह कमाई अक्सर डॉलर में होती है।

3. NRI द्वारा भेजा गया पैसा
विदेशों में रहने वाले भारतीय जब अपने परिवार को पैसा भेजते हैं, तो देश में विदेशी मुद्रा आती है।

4. विदेशी निवेश से
जब विदेशी निवेशक भारत में शेयर, बॉन्ड, कंपनी या प्रोजेक्ट में पैसा लगाते हैं, तो डॉलर भारत में आते हैं।

अगर देश में डॉलर की सप्लाई ज्यादा हो जाए, तो डॉलर सस्ता हो सकता है और रुपया मजबूत हो सकता है।

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3. मांग और सप्लाई से रेट कैसे बदलता है?

इसे बहुत आसान उदाहरण से समझिए।

मान लीजिए बाजार में डॉलर कम हैं, लेकिन खरीदने वाले लोग बहुत ज्यादा हैं। ऐसे में डॉलर की कीमत बढ़ जाएगी।

जैसे:

पहले:
1 डॉलर = 83 रुपये

डॉलर की मांग बढ़ी:
1 डॉलर = 85 रुपये

इसका मतलब है कि अब वही 1 डॉलर खरीदने के लिए 83 की जगह 85 रुपये देने पड़ रहे हैं। इसे कहते हैं रुपये का कमजोर होना।

अब उल्टा सोचिए। अगर भारत में डॉलर ज्यादा आ रहे हैं और डॉलर खरीदने वाले कम हैं, तो डॉलर सस्ता हो सकता है।

पहले:
1 डॉलर = 85 रुपये

डॉलर की सप्लाई बढ़ी:
1 डॉलर = 83 रुपये

इसका मतलब है कि अब डॉलर खरीदने के लिए कम रुपये देने पड़ रहे हैं। इसे कहते हैं रुपये का मजबूत होना।

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4. रुपया कमजोर कब होता है?

रुपया कमजोर होने का मतलब है कि डॉलर महंगा हो गया।

रुपया कमजोर होने के मुख्य कारण:

1. भारत का आयात ज्यादा होना
भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है। अगर तेल महंगा हो जाए या भारत ज्यादा तेल खरीदे, तो डॉलर की मांग बढ़ती है।

2. विदेशी निवेशक पैसा निकालें
अगर विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालकर अमेरिका या दूसरे देशों में ले जाएँ, तो वे रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं। इससे डॉलर महंगा हो सकता है।

3. अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ना
अगर अमेरिका में ब्याज दरें ज्यादा आकर्षक हों, तो निवेशक भारत जैसे देशों से पैसा निकालकर अमेरिका में लगा सकते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है।

4. व्यापार घाटा बढ़ना
अगर भारत विदेशों से ज्यादा खरीद रहा है और विदेशों को कम बेच रहा है, तो डॉलर देश से ज्यादा बाहर जाता है।

5. वैश्विक डर या युद्ध जैसी स्थिति
जब दुनिया में अनिश्चितता बढ़ती है, तो निवेशक अक्सर डॉलर को सुरक्षित मुद्रा मानकर डॉलर खरीदते हैं। इससे डॉलर मजबूत हो जाता है।

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5. रुपया मजबूत कब होता है?

रुपया मजबूत होने का मतलब है कि डॉलर सस्ता हो गया।

रुपया मजबूत होने के कारण:

1. भारत में विदेशी निवेश बढ़े
अगर विदेशी निवेशक भारत में पैसा लगाएँ, तो डॉलर भारत में आते हैं।

2. निर्यात बढ़े
अगर भारत विदेशों को ज्यादा सामान और सेवाएँ बेचता है, तो देश में डॉलर की आमद बढ़ती है।

3. NRI ज्यादा पैसा भेजें
विदेश में रहने वाले भारतीय जब ज्यादा पैसा भारत भेजते हैं, तो डॉलर की सप्लाई बढ़ती है।

4. कच्चे तेल की कीमत कम हो
तेल सस्ता होने पर भारत को आयात के लिए कम डॉलर खर्च करने पड़ते हैं।

5. भारत की अर्थव्यवस्था पर भरोसा बढ़े
अगर निवेशकों को लगे कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है, तो वे भारत में पैसा लगाते हैं।

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6. क्या RBI डॉलर-रुपया रेट तय करता है?

RBI सीधे यह नहीं कहता कि आज 1 डॉलर 83 रुपये ही रहेगा या 85 रुपये ही रहेगा। बाजार में मांग और सप्लाई से रेट बनता है। लेकिन RBI बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव रोकने के लिए दखल दे सकता है। हाल के बयानों में भी RBI पक्ष ने कहा है कि रुपये की कीमत बाजार की ताकतों से तय होती है और RBI किसी खास स्तर को लक्ष्य नहीं बनाता।

RBI के पास विदेशी मुद्रा भंडार होता है। जरूरत पड़ने पर RBI बाजार में डॉलर बेच या खरीद सकता है।

अगर डॉलर बहुत तेजी से महंगा हो रहा हो:
RBI अपने भंडार से डॉलर बेच सकता है। इससे बाजार में डॉलर की सप्लाई बढ़ती है और डॉलर की तेजी कम हो सकती है।

अगर डॉलर बहुत तेजी से सस्ता हो रहा हो:
RBI डॉलर खरीद सकता है। इससे बाजार से डॉलर कम होते हैं और रुपये की बहुत तेज मजबूती को रोका जा सकता है।

इसलिए कहा जाता है कि भारत में रेट पूरी तरह फिक्स भी नहीं है और पूरी तरह खुला भी नहीं छोड़ा गया। यह बाजार से तय होता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर RBI स्थिरता बनाए रखने की कोशिश करता है।

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7. बैंक और मनी एक्सचेंजर अलग-अलग रेट क्यों बताते हैं?

आपने देखा होगा कि गूगल पर डॉलर का एक रेट दिखता है, बैंक में दूसरा और मनी एक्सचेंजर के पास तीसरा।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि:

1. इंटरबैंक रेट अलग होता है
बड़े बैंक आपस में जिस रेट पर डॉलर खरीदते-बेचते हैं, उसे इंटरबैंक रेट कहा जाता है।

2. ग्राहक रेट में मार्जिन जुड़ा होता है
जब आम आदमी बैंक या मनी एक्सचेंजर से डॉलर खरीदता है, तो उसमें बैंक का मार्जिन, शुल्क और सर्विस चार्ज जुड़ सकता है।

3. खरीदने और बेचने का रेट अलग होता है
बैंक डॉलर खरीदने का रेट अलग रखता है और डॉलर बेचने का रेट अलग। इसी अंतर से बैंक या एक्सचेंजर कमाई करता है।

उदाहरण:

बैंक आपसे डॉलर खरीद सकता है:
1 डॉलर = 83 रुपये

लेकिन आपको डॉलर बेच सकता है:
1 डॉलर = 84 रुपये

यह अंतर बैंक का मार्जिन हो सकता है।

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8. डॉलर महंगा होने से आम आदमी पर क्या असर पड़ता है?

डॉलर महंगा होने का असर आम लोगों तक भी पहुँचता है।

1. पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है
भारत कच्चा तेल आयात करता है। तेल का भुगतान डॉलर में होता है। डॉलर महंगा होगा तो आयात महंगा हो सकता है।

2. विदेशी सामान महंगे हो सकते हैं
मोबाइल, लैपटॉप, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स, मशीनें और कई कच्चे माल महंगे हो सकते हैं।

3. विदेश में पढ़ाई महंगी हो जाती है
फीस, रहने का खर्च और यात्रा खर्च रुपये में ज्यादा लगने लगता है।

4. महंगाई बढ़ सकती है
अगर आयातित चीजें महंगी होती हैं, तो उनका असर बाजार की कीमतों पर पड़ सकता है।

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9. डॉलर महंगा होने से किसे फायदा हो सकता है?

डॉलर महंगा होना सभी के लिए नुकसानदायक नहीं होता। कुछ लोगों और कंपनियों को फायदा भी हो सकता है।

1. निर्यातकों को फायदा
जो कंपनियाँ विदेश में सामान या सेवाएँ बेचती हैं, उन्हें डॉलर में भुगतान मिलता है। डॉलर महंगा होने पर वे डॉलर को रुपये में बदलकर ज्यादा रुपये पा सकती हैं।

2. IT कंपनियों को फायदा
कई IT कंपनियाँ विदेशों से डॉलर में कमाई करती हैं। डॉलर मजबूत होने पर उनकी रुपये में कमाई बढ़ सकती है।

3. विदेश से पैसा भेजने वालों के परिवार को फायदा
अगर NRI भारत में पैसा भेजते हैं, तो डॉलर महंगा होने पर उनके परिवार को ज्यादा रुपये मिलते हैं।

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10. एक छोटा उदाहरण

मान लीजिए भारत को अमेरिका से मशीन खरीदनी है, जिसकी कीमत है:

1000 डॉलर

अगर रेट है:

1 डॉलर = 80 रुपये

तो मशीन की कीमत होगी:

1000 80 = 80,000 रुपये

अब अगर डॉलर महंगा होकर हो जाए:

1 डॉलर = 85 रुपये

तो वही मशीन होगी:

1000 85 = 85,000 रुपये

यानी डॉलर महंगा होने से आयातित चीज की कीमत 5,000 रुपये बढ़ गई।

इसीलिए डॉलर-रुपया रेट देश की अर्थव्यवस्था, व्यापार और आम आदमी की जेब पर असर डालता है।

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11. क्या रुपया कमजोर होना हमेशा बुरा है?

नहीं, हमेशा नहीं।

रुपया कमजोर होने से आयात महंगे होते हैं, जिससे महंगाई बढ़ सकती है। लेकिन इससे निर्यातकों को फायदा हो सकता है क्योंकि उन्हें डॉलर की कमाई के बदले ज्यादा रुपये मिलते हैं।

इसी तरह रुपया बहुत ज्यादा मजबूत हो जाए तो आयात सस्ते हो सकते हैं, लेकिन निर्यातकों को नुकसान हो सकता है क्योंकि उनकी कमाई रुपये में घट सकती है।

इसलिए किसी भी देश के लिए बहुत ज्यादा तेजी से मुद्रा का कमजोर या मजबूत होना ठीक नहीं माना जाता। स्थिरता ज्यादा जरूरी होती है।

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निष्कर्ष

डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत मुख्य रूप से बाजार में डॉलर की मांग और सप्लाई से तय होती है। जब डॉलर की मांग बढ़ती है, तो डॉलर महंगा और रुपया कमजोर होता है। जब डॉलर की सप्लाई बढ़ती है, तो डॉलर सस्ता और रुपया मजबूत हो सकता है।

RBI रोज बैठकर डॉलर का भाव फिक्स नहीं करता, लेकिन अगर बाजार में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव हो तो RBI डॉलर खरीदकर या बेचकर स्थिरता लाने की कोशिश कर सकता है। इसलिए भारत में डॉलर-रुपया रेट को समझने के लिए तीन बातें याद रखनी चाहिए:

मांग बढ़ेगी तो डॉलर महंगा होगा।
सप्लाई बढ़ेगी तो डॉलर सस्ता होगा।
बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव हो तो RBI दखल दे सकता है।

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