काशी में चमत्कार की आहट
जहां सत्ता के सूरमा फेल हुए, वहां बृजेश सिंह की खामोश एंट्री; जगन्नाथ मंदिर की 150 करोड़ की विरासत बचाने का उठाया बीड़ा
काशी में चमत्कार की आहट
जहां सत्ता के सूरमा फेल हुए, वहां बृजेश सिंह की खामोश एंट्री; जगन्नाथ मंदिर की 150 करोड़ की विरासत बचाने का उठाया बीड़ा
अमर सिंह का रुतबा, सुबोधकांत का मंत्रालय, सुनील ओझा का सियासी कद भी नहीं दिला पाया न्याय; शाहपुरी परिवार बोला- जगन्नाथ की मर्जी, वाल्मीकि भी तो बदले थे
वाराणसी। बाबा विश्वनाथ की काशी में अस्सी घाट से सटे 250 साल पुराने श्री जगन्नाथ मंदिर की दीवारों से अब एक नई इबारत लिखी जा रही है। जिस दर पर कांग्रेस के सुबोधकांत सहाय, सपा के अमर सिंह और भाजपा के सुनील ओझा जैसे सियासत के सूरमा नाकाम लौटे, वहां अब बृजेश सिंह की खामोश दस्तक ने हलचल मचा दी है। मंदिर ट्रस्ट की डेढ़ सौ करोड़ से ज्यादा की एक लाख वर्ग फीट जमीन को कब्जामुक्त कराने और जीर्णोद्धार की उम्मीद फिर जगी है।
पुरी के बाद देश का दूसरा जगन्नाथ धाम
1780 में बेनीराम ने असि-गंगा संगम पर लखौरिया ईंटों से इस मंदिर की नींव रखी थी। जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काठ की मनोहारी मूर्तियां यहां विराजमान हैं। 1802 में यहीं से शुरू हुई रथयात्रा ने बनारस को रथयात्रा मोहल्ला दिया। पंचक्रोशी परिक्रमा मार्ग का यह अहम पड़ाव आज कब्जों के बोझ तले कराह रहा है।
बेनीराम के वंशज दीपक शाहपुरी और आलोक शाहपुरी इस विरासत के मौजूदा संरक्षक हैं। 1975 में ही शाहपुरी परिवार ने पार्किंग और जनहित के लिए ट्रस्ट की जमीन सरकार को निशुल्क देने का प्रस्ताव रखा था। मगर फाइलें दफ्तरों में दम तोड़ती रहीं और मंदिर प्रांगण में होटल-मकान उगते गए। हालात ऐसे हुए कि ट्रस्टी परिवार का मंदिर आना तक मुश्किल हो गया।
तीन दशक, तीन दिग्गज, एक नाकामी
1. अमर सिंह का जलजला: 2005 में सपा राज में अमर सिंह लाव-लश्कर के साथ असि पहुंचे। मल्टीलेवल पार्किंग और जीर्णोद्धार का ऐलान हुआ। सत्ता बदली और योजना धूल फांकने लगी।
2. सुबोधकांत का वादा: 2009 में यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ने पर्यटन योजनाओं से ट्रस्ट को जोड़ा। मंत्रालय जाते ही फाइलें बंद हो गईं।
3. सुनील ओझा की आखिरी उम्मीद: 2021 में पीएम मोदी के करीबी सुनील भाई ओझा ने शाहपुरी बंधुओं की सीएम योगी से मुलाकात कराई। एमएलसी धर्मेंद्र सिंह भी साथ थे। सुनील ओझा के असमय निधन ने सारी मेहनत पर पानी फेर दिया।
माफिया की एंट्री, बदला नजारा
पिछले कुछ महीनों से बृजेश सिंह का नाम जगन्नाथ मंदिर से जुड़ते ही काशी का सियासी पारा चढ़ गया है। मंदिर के आयोजनों में उनकी मौजूदगी की तस्वीरें वायरल हैं। शहर में कानाफूसी है- कहीं कब्जा तो नहीं? लेकिन ट्रस्टी आलोक शाहपुरी दो टूक कहते हैं, "जगन्नाथ जी की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। महर्षि वाल्मीकि का अतीत क्या था? भगवान जिसे माध्यम बनाना चाहें, वही बनेगा।"
चौंकाने वाली बात यह है कि बृजेश सिंह ने कब्जे की बजाय शाहपुरी बंधुओं को आगे रखकर दूसरी बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कराई। सरकारी अधिग्रहण की फाइल फिर दौड़ पड़ी है। असर जमीन पर दिख रहा है। सालों से रस्म अदायगी तक सिमटे मंदिर के कार्यक्रमों में भीड़ लौटने लगी है। अवैध कब्जे भी सिमट रहे हैं। स्थानीय लोग खुद जीर्णोद्धार में जुट गए हैं।
सवाल अब भी कायम
पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र में विकास के लिए रोज जमीन अधिग्रहित हो रही है, वहीं शाहपुरी परिवार अपनी एक लाख वर्ग फीट जमीन निशुल्क देने को दर-दर भटकता रहा। अब जब बृजेश सिंह ने कमान संभाली है तो सवाल उठ रहा है- क्या जगन्नाथ जी अपने धाम को संवारने का श्रेय उसी शख्स को देंगे जिसका अतीत सवालों के घेरे में रहा है? काशी इसका जवाब तलाश रही है।