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कविता : पिता

पिता कोई साधारण शब्द नहीं,
यह तो जीवन का आधार होता है।
जिसके कंधों पर घर टिका हो,
वही सच्चा परिवार होता है।

माँ ममता की गंगा होती,
तो पिता हिमालय जैसे हैं।
खुद धूप में जलते रहते,
पर बच्चों के लिए साये हैं।

सुबह-सुबह जब सूरज जागे,
पिता पहले उठ जाते हैं।
अपने सपनों को भूलकर,
हमारे सपने सजाते हैं।

फटे पुराने कपड़े पहनें,
पर हमें नया दिलाते हैं।
खुद भूखे रह लेते लेकिन,
हमको भरपेट खिलाते हैं।

चेहरे पर गंभीरता रखकर,
दिल में प्यार छुपाते हैं।
कम शब्दों में जीवन भर का,
अनुभव हमें सिखाते हैं।

उनकी डाँट भी मीठी लगती,
उसमें छिपा दुलार होता।
हर मुश्किल में साथ खड़े हों,
जैसे मजबूत दीवार होता।

जब दुनिया हमको ठुकराए,
पिता हिम्मत बन जाते हैं।
टूटी हुई उम्मीदों में भी,
नए दीप जलाते हैं।

उनकी उँगली पकड़-पकड़ कर,
हमने चलना सीखा है।
जीवन के हर कठिन सफर में,
संभलना सीखा है।

पिता वो बरगद का पेड़ हैं,
जिसकी छाया प्यारी है।
जिसके होने से ही घर में,
खुशियों की फुलवारी है।

कभी नहीं वो जतलाते हैं,
कितना दर्द सहा करते।
बस बच्चों की खातिर अपने,
सपनों का गला दबा करते।

ईश्वर का सबसे सुंदर रूप,
यदि इस धरती पर मिलता है।
तो माँ की ममता में मिलता,
और पिता के त्याग में मिलता है।

इसलिए हर बच्चे को अपने,
पिता का सम्मान करना चाहिए।
उनके चरणों की धूल को भी,
सिर आँखों पर धरना चाहिए।

क्योंकि पिता के बिना जीवन,
सूना-सूना लगता है।
उनके आशीर्वाद से ही तो,
हर रास्ता आसान लगता है।

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