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कविता : हक़ीक़त

हक़ीक़त कोई सपना नहीं,
जो आँख खुलते मिट जाए,
यह वो धूप है जीवन की,
जो हर चेहरे को पढ़ जाए।

कभी यह आँसू बनती है,
कभी बन जाती मुस्कान,
कभी टूटे दिल की चुप्पी,
कभी उम्मीदों की उड़ान।

हम अक्सर झूठ के पीछे,
दुनिया भर दौड़ लगाते हैं,
रंगीन मुखौटों के अंदर,
अपने सच को छुपाते हैं।

पर एक दिन ऐसा आता है,
जब आईना बोल उठता है,
मन के भीतर सोया सच,
धीरे-धीरे खोल उठता है।

हक़ीक़त की राह कठिन सही,
पर मंज़िल सच्ची होती है,
झूठ चमकता कुछ पल केवल,
सच की उम्र तो लंबी होती है।

कितने रिश्ते टूट गए हैं,
बस थोड़ी सी नादानी में,
लोग बदलते जाते हैं अब,
मतलब की निगरानी में।

चेहरों पर मुस्कान बहुत है,
दिल मगर अकेला मिलता,
भीड़ भरे इस शहर में भी,
इंसान अधूरा-सा दिखता।

हक़ीक़त यह भी है कि यहाँ,
हर कोई कुछ खोता है,
जो बाहर से हँसता दिखता,
वो अंदर-अंदर रोता है।

किसी के हिस्से धूप अधिक,
किसी के हिस्से छाँव रही,
किसी की झोली भर आई,
किसी की आँखें प्यास रही।

फिर भी जीवन चलता रहता,
रुकता नहीं समय का पहिया,
गिरकर उठना सिखा रही है,
हर मुश्किल की कड़वी माया।

हक़ीक़त केवल दर्द नहीं,
इसमें प्रेम भी रहता है,
सूखे पेड़ों की शाखों पर,
आशा का फूल भी खिलता है।

माँ की ममता की गर्मी में,
सच्चाई का स्वर मिलता,
पिता के थके हुए हाथों में,
संघर्षों का घर मिलता।

मज़दूरों के पसीने में भी,
एक सुनहरा कल होता है,
धरती पर मेहनत करने वाला,
सबसे सच्चा पल होता है।

हक़ीक़त यह भी कहती है,
कुछ भी सदा नहीं रहता,
राजा हो या रंक कोई,
सबको एक दिन है ढहना।

जो आज गगन को छूता है,
कल मिट्टी में मिल जाता,
अहंकारों का हर पर्वत,
समय सामने झुक जाता।

इसलिए इतना याद रखो,
सच से कभी न भागो तुम,
झूठ के महलों से अच्छा,
सच्चाई का एक घर चुनो तुम।

हक़ीक़त कड़वी हो सकती है,
पर उसमें ही जीवन बसता,
जो सच को अपनाना सीख गया,
वही इंसान बड़ा बनता।

जब दुनिया धोखा दे जाए,
और कोई साथ न आए,
तब अपने भीतर झाँकना,
सच ही तुम्हें राह दिखाए।

हक़ीक़त की लौ जलाकर ही,
अंधियारों से लड़ पाओगे,
झूठ के सागर में डूबे तो,
खुद को कभी न बचा पाओगे।

इस दुनिया की सबसे बड़ी,
दौलत केवल सच्चाई है,
जिसने इसे दिल में रखा,
उसने ही असली जीत पाई है।

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