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कविता : सफ़र

सफ़र कभी आसान नहीं,
राहों में काँटे होते हैं,
कुछ सपने टूट भी जाते,
कुछ अपने रूठे होते हैं।

फिर भी मन चलता रहता,
नई दिशाओं की चाह लिए,
आँखों में उजले कल के,
सैकड़ों सुनहरे राह लिए।

सफ़र केवल पगडंडी का,
या मंज़िल तक जाना नहीं,
सफ़र तो खुद को पहचानना,
जीवन को समझ पाना यहीं।

कभी धूप तपाती माथा,
कभी छाँव गले लगती है,
कभी खुशी गीत सुनाती,
कभी पीड़ा भी जगती है।

चलते-चलते राहों में,
कितने चेहरे मिल जाते,
कुछ पल भर के साथी बनकर,
यादों में फिर बस जाते।

कोई हँसना सिखलाता है,
कोई आँसू दे जाता है,
कोई टूटे मन के भीतर,
उम्मीदों का दीप जलाता है।

रेल की खिड़की से जैसे,
दुनिया पीछे छूट रही,
वैसे ही जीवन की घड़ियाँ,
धीरे-धीरे टूट रही।

नदियों जैसा बहना सीखो,
पर्वत जैसा अडिग रहो,
आँधी आए लाख मगर तुम,
अपने पथ पर दृढ़ रहो।

सफ़र में रातें भी होंगी,
अंधियारा भी आएगा,
लेकिन हर काली रातों के बाद,
सूरज फिर मुस्काएगा।

कभी अकेलापन घेर लेगा,
मन भीतर से रोएगा,
पर वही अकेला इंसान,
एक दिन इतिहास संजोएगा।

पंछी जब उड़ना सीखता,
घोंसला पीछे छूटता है,
तब जाकर खुले गगन में,
उसका सपना फूटता है।

जीवन भी इक लंबा सफ़र,
जिसका कोई ठिकाना नहीं,
हर पल चलते जाना इसमें,
रुक जाना तो बहाना नहीं।

कुछ लोग दौलत खोजेंगे,
कुछ नाम कमाने निकलेंगे,
कुछ प्रेम की राहों में,
अपने सपने सजाने निकलेंगे।

मगर असली मुसाफ़िर वह,
जो सच की राह अपनाता,
हर दुख में भी मुस्कुराकर,
मानवता का दीप जलाता।

सफ़र हमें सिखलाता है,
हार के बाद संभलना क्या,
टूटे हुए अरमानों को,
फिर से दिल में पलना क्या।

कभी गाँव की मिट्टी याद आए,
कभी शहर बुलाता है,
कभी बीता बचपन चुपके से,
आँखों में उतर आता है।

माँ की दुआएँ साथ चलें,
पिता का आशीर्वाद मिले,
तो कठिन से कठिन रास्तों में भी,
जीने का संवाद मिले।

चलते रहना ही जीवन है,
रुकना तो वीरानों सा,
जो चलता है वही पाता,
सागर, पर्वत, आसमान सा।

एक दिन ऐसा आएगा,
जब सफ़र पूरा हो जाएगा,
मगर कर्मों की खुशबू से,
नाम अमर हो जाएगा।

इसलिए ऐ मुसाफ़िर सुन,
मत डर तू तूफ़ानों से,
मंज़िल खुद झुक जाएगी,
तेरे सच्चे अरमानों से।

चलते रहना, बढ़ते रहना,
यही जीवन का सार है,
सपनों से जो प्रेम करे,
उसी का सुंदर संसार है।

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