श्वेत क्रांति की नई इबारत:
बांके बाजार में 'मोनेया' ने रचा इतिहास, किसानों के खिले चेहरे,
श्वेत क्रांति की नई इबारत:
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
गयाजी: ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले कृषि और पशुपालन क्षेत्र को अगर सही दिशा और ईमानदारी का नेतृत्व मिले, तो बदलाव की तस्वीर कितनी सुनहरी हो सकती है, इसका जीवंत उदाहरण बांके बाजार प्रखंड में देखने को मिला।
प्रखंड अंतर्गत "मोनेया दुग्ध उत्पादक सहयोग समिति लिमिटेड" द्वारा आयोजित षष्ठम (6ठा) बोनस वितरण समारोह महज एक सरकारी या सहकारी रस्म अदायगी नहीं था, बल्कि यह क्षेत्र के दुग्ध उत्पादक किसानों के पसीने की कमाई और उनकी मेहनत को मिला एक ऐतिहासिक सम्मान था।
मेहनत का मीठा फल:
जब किसानों के हाथों में आया बोनस,
सहकारिता की असली ताकत तब दिखती है जब मुनाफे का सीधा हिस्सा उसके असली हकदार यानी जमीन से जुड़े किसानों तक पहुँचता है।
मोनेया दुग्ध उत्पादक सहयोग समिति ने अपने छठे बोनस वितरण समारोह में यही कर दिखाया।
कार्यक्रम के दौरान जब पुरुष और महिला कृषकों के बीच बोनस की राशि का वितरण किया गया, तो उपस्थित किसानों के चेहरे आत्मसंतोष और गौरव से चमक उठे।
यह बोनस इस बात का प्रमाण है कि ईमानदारी से संचालित समितियाँ ग्रामीण इलाकों में आर्थिक आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा माध्यम बन सकती हैं।
प्रो. राधेश्याम प्रसाद का आह्वान: 'पशुपालन ही ग्रामीण समृद्धि की चाबी'
इस गरिमामयी समारोह के मुख्य केंद्र बिंदु रहे प्रख्यात शिक्षाविद् और क्षेत्र के सम्मानित मार्गदर्शक प्रो. राधेश्याम प्रसाद जी।
कार्यक्रम में भाग लेकर उन्होंने न केवल विजेता और कर्मठ किसानों को सम्मानित किया, बल्कि अपने ओजस्वी संबोधन से पूरे माहौल में एक नई ऊर्जा फूंक दी।
"खेती के साथ-साथ दुग्ध उत्पादन और पशुपालन हमारे ग्रामीण समाज की आर्थिक रीढ़ है।
महिला और पुरुष कृषक मिलकर जिस तरह श्वेत क्रांति को आगे बढ़ा रहे हैं, वह अनुकरणीय है।
हमें आधुनिक तकनीकों को अपनाकर दूध के उत्पादन और उसकी गुणवत्ता को और बेहतर करना होगा।"
प्रो. राधेश्याम प्रसाद
उन्होंने विशेष रूप से महिला कृषकों की भागीदारी की सराहना करते हुए कहा कि जब आधी आबादी इस तरह के आत्मनिर्भर अभियानों से जुड़ती है, तो पूरा परिवार और समाज सशक्त होता है।
प्रो. प्रसाद ने किसानों को प्रोत्साहित करते हुए आश्वस्त किया कि उनकी मेहनत को सही मंच और सही मूल्य दिलाने के लिए ऐसे प्रयास निरंतर जारी रहने चाहिए।
आधी आबादी को मिला नया हौसला
इस समारोह की सबसे खूबसूरत तस्वीर रही महिला दुग्ध उत्पादकों की भारी भागीदारी।
ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर महिलाओं का योगदान पर्दे के पीछे रह जाता है, लेकिन 'मोनेया' के इस मंच पर महिलाओं ने बढ़-चढ़कर अपना हक और सम्मान प्राप्त किया।
पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर दूध उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन रही इन महिलाओं ने यह साबित कर दिया कि वे बांके बाजार की नई आर्थिक शक्ति हैं।
सहकारिता की यह लौ बुझनी नहीं चाहिए
बांके बाजार के मोनेया की यह सफलता महज एक प्रखंड तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे पूरे जिले और राज्य के लिए एक मॉडल (नजीर) के रूप में देखा जाना चाहिए।
आज के दौर में जब कृषि पर लागत बढ़ रही है, ऐसे समय में दुग्ध उत्पादन किसानों के लिए एक मजबूत 'सुरक्षा कवच' साबित हो रहा है।
मोनेया दुग्ध उत्पादक सहयोग समिति लि0 और प्रो. राधेश्याम प्रसाद जी जैसे प्रबुद्ध मार्गदर्शकों की यह जुगलबंदी सराहनीय है।
उम्मीद है कि इस छठे बोनस वितरण से प्रेरणा लेकर क्षेत्र के अन्य किसान भी पशुपालन की ओर आकर्षित होंगे और बांके बाजार में श्वेत क्रांति का यह कारवां दिनों-दिन और मजबूत होगा।
जय किसान, जयसहकारिता